Yuddh Vidya Aur Mahayogi

युद्ध विद्या और महायोगी

posted Jun 23, 2011, 9:47 AM by Site Designer   [ updated Jun 23, 2011, 10:03 AM ]

                                              वीर योद्धा महायोगी
 
शास्त्र विद्या तब तक पूर्ण नहीं होती जब तक कि शस्त्र विद्या और युद्ध कौशल नहीं सीख लिया जाता, कौलान्तक पीठ सबसे प्राचीन युद्ध कला "वनशिरा युद्ध कला" के लिए विश्व प्रसिद्द है, जिसमें शस्त्र के तौर पर "ग़ज युद्ध" "तलवार युद्ध" "शांगल युद्ध" "कुल्हाड़ी अथवा दरात युद्ध"  देखते ही बनता है, कौलान्तक पीठाधीश्वर महायोगी सत्येन्द्र नाथ जी महाराज इस युद्ध विद्या के 18 भागों को भली प्रकार जानते हैं, किन्तु इस युद्ध विद्या को केवल वही सीख सकता हो जो इसका प्रदर्शन अपनी शक्ति के लिए कभी न करे, बिना कारण होने बाली लड़ाई में भले ही हारना पड़े किन्तु अपनी युद्ध विद्या का प्रदर्शन नियम विरुद्ध माना जाता है, कौलान्तक पीठाधीश्वर महायोगी जी को मैंने हिमालयों पर महायोगी जी को न केवल "वनशिरा युद्ध" का अभ्यास करते हुए देखा है बल्कि "हडिम्ब युद्ध" "कपि युद्ध" "नाग युद्ध" व "महाकाल युद्ध" आदि का शानदार अभ्यास करते हुए भी देखा है, तब मैं बहन मञ्जूषा जी को कहता था कि कुछ भी करके इन सबकी विडिओ रिकार्डिंग कर सुरक्षित रखना चाहिए, किन्तु तब भी धन का अभाव ही आड़े आता था, जो अभी भी बरकरार है, अन्यथा आप अगर विडिओ में ही एक झलक देख लें तो आपको जरूर ये देख कर गर्व होगा कि भारत में कैसी-कैसी दुर्लभ विद्याएँ छिपी हुई हैं, अब आप ही बताइए कि क्या महायोगी जी कोई साधारण व्यक्ति हैं? उनकी अपने लिए की गई तैयारियां कितनी विस्तृत हैं? महायोगी जी कहते हैं कि "मैं एक शिष्य बनना चाहता हूँ, अपने गुरु का सबसे लाडला शिष्य, उसके लिए मैं हर संभव प्रयास करूँगा, गुरु जी ने जिन विद्याओं को सीखने को कहा मैंने सीखीं, अन्यथा मुझ जैसे बालक पर कौन कृपा करता, ये सब तो केवल गुरु महाराज की कृपा ही है" इन वाक्यों से आप समझ सकते हैं कि महायोगी जी कितने लक्ष्य भेदी हैं? त्रिशूल सदा धारण करने वाले योगिराज दैविक सौन्दर्य की प्रतिमूर्ति हैं, महायोगी जी से धर्म, ज्योतिष,योग,तंत्र आदि तो बहुत से सीख रहे हैं किन्तु युद्ध विद्या का एक भी शिष्य तैयार नहीं हुआ, जो इस विद्या के लिए दुखद पहलू भी है, किन्तु महायोगी जी इन प्राचीन विद्याओं के पूर्ण जानकार हैं, महायोगी जी नें अपने गुरु से प्रार्थना पूर्वक इस विद्या पर लेखन की अनुमति मांगी है, क्योंकि इस विद्या को सदियों से लिखा नहीं गया, कहा जाता है कि इसकी आज्ञा नहीं है, इसलिए इसे जान पाना या सीख पाना बहुत ही जटिल है, केवल गुरु से सीधे सीखना होता है, इस तरह तो इन विद्याओं का नाम तक समाप्त हो जाएगा,

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