Maha 'MOKSHA' Sadhana Deeksha Shivir 8-9 June 2013


    'रसेश्वरी साधना दीक्षा एवं पारद विज्ञान प्रयोग' 

रस का अर्थ होता है पारा और पारा शिव का तेजस कहलाता है। शिव अघोर हैं और उनकी प्रिय धातु पारा भी उनसा ही अघोर है। शिव और पारे के अनेकों अनसुलझे रहस्य हैं, जिनकी कोई थाह नहीं। जिस प्रकार ह्रदय के रस भाव होते हैं, उसी प्रकार धातुओं का भाव और रस पारे में हैं। पारा यूँ तो एक तरल धातु है लेकिन ये सिद्धों का बड़ा ही प्रिय है। प्राचीन काल से भारत से ले कर मिस्र, रोम, यूनान, चीन, फारस सहित लगभग सभी स्थानों पर पारे का रहस्यमय प्रयोग किया गया है। जिसे उनहोंने अपने-अपने नाम दिए। हम बात भारत की करते हैं जहाँ पारद विज्ञान रस शास्त्र के अंतर्गत आता है जिसे "रस वेद" भी कहा गया है। हिमालय के सिद्धों नें पारे से भस्म बना कर अनेकों-अनेक जटिल रोगों का उपचार किया है व सिद्ध नाम की चिकित्सा पद्धति संसार को दी, जो आज भी प्रचलित है, अनेकों वृहद् भाग हैं। लेकिन हम आपको वो कारण बताने बताने जा रहे हैं जिस कारण पारद विज्ञान दुनिया भर में फैला। 

१) लोहे और ताम्बे जैसी धातुओं को स्वर्ण में बदलना-शिव स्वयम शक्ति को आगम निगमों में ये बताते हैं की "देवी पारद सर्वश्रेष्ठ है और उसमें मेरा निवास है। पारद को कल्पवृक्ष जानना चाहिए। यदि कोई सिद्ध पारे को बाँध कर उसके संस्कार भली प्रकार कर ले तो वो पदार्थ परिवर्तन सहित कई गोपनीय सिद्धियों को प्राप्त कर सकता है। किन्तु रस को बांधना पाप के अंतर्गत आता है। इसलिए मैं ये अधिकार केवल शैव और कौलाचारियों को प्रदान करता हूँ। इस गोपनीय विद्या को पापी, कुकर्मी, व्यसनी, अपराधी, व्यभिचारी, अश्रद्धावान और अदीक्षित को कभी भी प्रदान नहीं करना चाहिए। देवी! इस विद्या द्वारा निश्चित ही धातुओं को स्वर्ण अथवा चंडी में परिवर्तित किया जा सकता है। इसी विधि द्वारा अनेकों गुप्त कामना सिद्धि मणियों का निर्माण किया जा सकता है। चिंतामणि, लालमणि, दिव्यमणि, अमृतमणि, तेजस मणि, पारस मणि आदि का निर्माण इसी पारद क्रिया द्वारा होता है। कायाकल्प , चिरंजीवी व नित्य तरुण आदि क्रियाएं भी इसी विद्या से संभव हैं। रसायन सब पर फलीभूत नहीं होता क्योंकि ये कोई सांसारिक विद्या नहीं है, की जिसका सब पर एक सामान प्रभाव हो। गुरु भक्त, नाथ कुल सेवक, शक्ति संगम मार्गीय, सूर्योपासकों सहित मेरे भक्त ही इस विद्या के रहस्यों को जान पाते हैं।"-रसेश्वर कौतुक तंत्र
              
               यही कारण रहा की विश्व भर से बड़े-बड़े तन्त्रचारी, आयुर्वेदाचारी, चिकित्सक, ज्योतिषी, नक्षत्रवेता, सम्राट व जादूगर-जादुगरनियाँ इस विद्या को सीखने के लिए भारत के दुर्गम हिमालयों तक पहुंचे। कश्मीर, कुलूत, महाचीन, त्रिगर्त , कामख्या, बंगाल, वीरक्षेत्र व नेपाल आदि देशों में इस विद्या का बहुत प्रचार था क्योंकि ये भूमि सिद्धों व नाथो की गोपनीय साधना भूमि थी। पराचीन सिद्ध और नाथ शैव और शाक्त थे व तंत्रमार्गी थे। इन सिद्धों की भैरवियां व स्वयं सिद्ध कभी बूढ़े नहीं होते थे, साथ ही इनकी आयु सैकड़ों वर्ष होती थी। यही सिद्ध भारत के राजाओं व व्यापारियों को अपनी सेवाओं के बदले स्वर्ण व चाँदी दिया करते थे। जिस कारण भारत सबसे ज्यादा सोने-चांदी वाला देश बन गया। इतना सोना-चंडी हुआ की देश को कई-कई बार लूट लेने के बाद भी सोना-चांदी कम नहीं हुआ। बड़े-बड़े जादूगर सिद्ध किये गए पारे को हासिल करने के लिए विश्व भर से भारत आने लगे। वो यहाँ से सिद्ध पारा ले जा कर उससे अपने-अपने देशों में चमत्कार करते और धन व शौहरत कमाते। जादुगरनियाँ और सम्राट लम्बी आयु और खोई जवानी वापिस पाने की चाहत में सिद्ध पारद हासिल करने भारत आते। बड़े-बड़े ज्योतिषी संस्कारित पारद गुट्टीका को हासिल करने के लिए नाथ सिद्धों की सेवा करते और गुट्टीका मिलने पर अपने देश जा कर सटीक भविष्यवाणियाँ करते। सबसे अनोखा विषय तो ये है की सिद्ध पारद को छूने से ही बहुत से असाध्य रोग तीन दिन के भीतर ठीक हो जाते थे। इसलिए मिस्र जैसे क्षेत्रों के लोग भी सिद्ध पारद के लिए कौलदेश यानि भारत आते। सबसे मजेदार बात तो ये है की पारा भारत में तब आसानी से उपलब्ध नहीं था। सारा पारा विदेशों से ही लाया जाता था। जिसे लाना आसान नहीं होता था क्योंकि पारा पृथ्वी की सबसे भारी धातु है। मणियाँ बनाने के लिए विश्व के लगभग हर महाद्वीप के सम्राट या उनके प्रतिनिधि कौलदेश यानि भारत आये और शुभ नक्षत्रों व काल में बनी मणियाँ अपने साथ ले गए।

२)दिव्य आध्यात्मिक और जदुआई शक्तियां-पारे के अनेक शोधन व संस्कार होते हैं, जिससे पारा सिद्ध हो जाता है। पारे के पूर्ण १०८ संस्कार होते है। जिनमेंसे १६ अति प्रमुख हैं व २६ संस्कारों तक का विवरण ग्रंथों में आपको मिल जाएगा। लेकिन मंत्र बद्ध और तांत्रोक्त पारा बेहद चमत्कारी हो जाता है। जिसका मनचाहा प्रयोग हो सकता है। जैसे प्राचीन विमान सिद्ध पारे की ऊर्जा से उड़ान भरते थे, कुण्डलिनी जागरण व शक्तिपात प्राप्त व प्रदान करने के लिए पारद का प्रयोग गुप्त रूप से होता था। सिद्ध पारे के प्रयोग से ही तांत्रिक जलगमन, वायुगमन व अदृश्य होने जैसी क्षमताएं प्राप्त करते थे। चक्रवर्ती सम्राट पारे का सेवन वीर बनने हेतु किया करते थे। साथ ही पारे के सिद्ध शिवलिंग की पूजा कर अजेय व मृत्युजयी हो जाते थे। सिद्ध पारद के आध्यात्म में इतने प्रयोग थे की जिनको बताना यहाँ संभव ही नहीं है। संक्षेप में कहा जाए तो तंत्र के षट्कर्म पारद विज्ञान के लिए खेल ही थे।

ये दो बड़े कारण रहे की विश्व का कोई देश या बुद्धिजीवी रसायन और पारद विज्ञान से अछूता नहीं रहा। यही रसायन और पारद विज्ञान आधुनिक कैमिस्ट्री का जनक है ये बात सभी जानते हैं। हालांकि आधुनिक कैमिस्ट्री तत्व की ठीक-ठीक भौतिक व्याख्या करता है व सभी प्रश्नों का ठीक उत्तर भी देता है। स्वयं "ईशपुत्र कौलान्तक नाथ" आधुनिक कैमिस्ट्री के छात्र रहे हैं। लेकिन आधुनिक कैमिस्ट्री केवल तत्वों के दृश्य विज्ञान को ही आधार मानती है जबकि प्राचीन रसायन शास्त्र का मानना है की धातुओं आदि में अपने कुछ पारलौकिक गुण होते हैं। बस यहीं से आधुनिक और प्राचीन अलग होते हैं अन्यथा दोनों में कोई ज्यादा भेद नहीं है। प्राचीन समय में रसायन को बड़ा ही श्रेष्ठ स्थान प्राप्त था लेकिन भारत को अपनी विद्याओं की अधिक प्रसिद्धि का खामियाजा भुगतना पडा और न विद्यायों को हासिल करने के लिए अनेक देशों के राजाओं और हमलावरों नें ग्रथों को लूट लिया व कई सिद्धों को उठा कर अपने देश ले गए और जो नहीं माने उनका बढ़ कर दिया। जिससे नए विद्यार्थियों नें भय के कारण इसे सीखना कम कर दिया और इसके जानकार एकांत में अपने प्रयोगों के लिए चले गए। आज रसायन यानि रस वेद को आधुनिक विज्ञान केवल एक कल्पना और कैमिस्ट्री का कम ज्ञान मानता है। वर्तमान काल में अब इसके जानकारों का मिलना ही अपने में बड़ी बात हो गई है। तथाकथित बुद्धिजीवियों ने ऐसा वातावरण दुनिया भर में बना दिया है की कोई भी इस पुरानी विद्या पर काम न कर सके, इसलिए इसके विरुद्ध किताबे लिखी गई, सेमीनार किये गए, पर्दाफाश जैसी कार्यशालाएं लगाई गई और इसे अंधविश्वास करार दे दिया गया। अब हालत ये है की न तो कोई इसे सीखेगा और ना ही किसी को सीखने दिया जाएगा। यदि आप और हम प्रयास करते हैं तो कहा जाएगा की ये गुमराह कर रहे हैं और धन हड़पने की साजिश रच रहे हैं साथ ही कानूनी कार्यवाही की धमकियां देंगे। लेकिन हम कहते हैं की पैसा हमारा है, हमने कमाया है और हम अपना प्रयोग करना चाहते हैं और उसमें धन लगायेंगे, क्योंकि ये हमारी स्वतंत्रता है। भले ही कुछ मिले या ना मिले।

चंद शब्दों में इतना बता देने से ही शायद आपको पारे और रसायन का महत्त्व पता चल गया होगा। लेकिन ये सब बताने का अर्थ ये बिलकुल नहीं की आप प्रस्तुत साधन करें ही करें। हम आपको कोई लालच या धोखा नहीं दे रहे व आपको वैधानिक रूप से चेतावनी देते हैं की आप हमारी साधनाओं व प्रयोगों में शामिल ना हों व दक्षिणा आदि ना दें। ये सभी प्रयोग व साधनाएँ केवल "कौलान्तक सम्प्रदाय" को मानने वालों के हैं। यदि इसके बाबजूद भी आप हमें प्रार्थना भेजते हैं तो उसके जिम्मेवार आर्थिक, मानसिक व शारीरिक रूप के साथ साथ समय हानि के आप स्वयं जिम्मेवार होंगे। यदि आपको लगता है की कोई ऐसी विद्या थी और खोजी जानी चाहिए व सीखी जानी चाहिए तो आप तभी अपने बुद्धि विवेक का प्रयोग कर साधना में सम्मिलित हों।

कुछ बातों का विशेष ध्यान रखें-

१) पारद विज्ञान और रसायन विज्ञान को कुशल मार्गदर्शक व कौल गुरु अथवा महाचेतना के सान्निध्य में ही संपन्न करें क्योंकि ये विज्ञान जटिलतम व गोपनीय होने के साथ ही अत्यंत प्राणघातक है। आपकी असावधानियों से व गुरु आज्ञा अह्वेलना से आपकी जान जा सकती है या स्थिति गंभीर हो सकती है। याद रखें की किताबों से देख कर या इंटरनेट देख कर अथवा कहीं पढ़-सुन कर रसायन और पारद के प्रयोग बिलकुल ना करें। अन्यथा स्थिति ऐसी हो सकती है की ना तो प्राण जाएँ और ना ही आप ठीक हों।

२) सिद्ध पंथ और नाथ पंथ में ये ज्ञान परम्परानुगत है। हिमालय के सिद्धों कौलाचारियों और महयोगियों को पारद विज्ञान व रसायन का पूर्ण ज्ञान होता है अत: उनकी कहानियां सुन कर वैसा ही करने का प्रयास ना करें। उनके पास जो पारा होता है वो रासायनिक विधियों व औषधियों द्वारा शोधित व मर्दित किया गया होता है। जिसमें कोई भी हानिकारक तत्व नहीं होते। बल्कि वो पारद अत्यंत बलशाली व चमतकारी होता है।

३) पारे को अभक्ष्य यानि नहीं खाए जाने वाला तत्व कहा गया है।पारा पूरी तरह से जहरीला होता है इसलिए किसी भी कारण इसका सेवन नहीं करना चाहिए। पारद भस्म का सेवन करने से पहले चिकित्सक की राय व पारद भस्म की शुद्धता का आंकलन करना बेहद जरूरी है क्योंकि ये आपकी जिंदगी का प्रश्न है। संस्कार करने के बाद भी पहले पारे का परीक्षण किया जाता है की कहीं ये जहरीला तो नहीं। इसके बाद कुशल गुरु और योग्य चिकित्सक की देख रेख में ही सिद्ध पारद गुट्टीका व भस्म का सेवन आदि किया जाता है। हम एक बार फिर आग्रह करते हैं की आप पारे का सेवन बिलकुल ना करें व इससे दूर ही रहें।

४) पारे को गर्म करने से बचें व पारद प्रयोगों के दौरान उत्पन्न होने वाली अत्यंत विषैली गैसों से विशेष सावधानी रखें। पारद व रसायन प्रयोगों के लिए कहीं दूर एकांत में अपने यंत्र आदि स्थापित कर ही पारद और रसायन प्रयोग करना चाहिए। पारे को मुख बंद पात्र में रखें व बच्चों की पहुँच से दूर रखें। यदि आपका प्रयोग संपन्न नहीं हुआ या किसी कारण पारे का प्रयोग नहीं हो सका तो उसे हर कहीं ना फेकें। क्योंकि पारे को फैकना शिव द्रोह कहलाता है। अत: पारे को किसी कबाड़ी या किसी प्रयोगशाला को दे दें। कसी भी कीमत पर नदी या पानी में पारे को ना फेकें।

५) आयुर्वेदिक जडी-बूटियों व अम्ल, रसायन का प्रयोग सावधानी से करें। अम्ल से अपनी त्वचा, आँखों को बचाए रखें व अम्लीय साँसे ना ले ये फेफड़ों को तुरंत गंभीर हानि पहुंचाता है। कहने तात्पर्य ये है की हर और से आपको पूर्ण सावधानी रखनी होगी। हाथों में आधुनिक चिकित्सीय दस्ताने पहन कर ही पारे को अपने हाथों में लेना चाहिए। हालांकि सावधान साधक सीधे अपने हाथों पर भी इसे ले सकता है। लेकिन थोड़ी सी मात्रा का शरीर में जाना कभी-कभी बड़ी मुसीबत बन सकता है।

६) क्योंकि ये सारी प्रणाली साधनात्मक है ना की कैमिस्ट्री इसलिये आपका सर्वप्रथम रसायन में अधिकार होना चाहिए। जो आपको गुरु दीक्षा यानी की "रसेश्वरी दीक्षा" से प्राप्त होगा। "रसेश्वरी साधना" ही पारद और रसायन की प्रथम साधना है जिससे आपको निश्चित ही अद्भुत सफलताएँ प्राप्त होती हैं। लेकिन "रासेश्वरी साधना" भी अपने आप में एक खतरनाक साधना दीक्षा है अत: किसी प्रकार की हानि ना हो इसलिए साधक को "स्वर्णाकर्षण भैरव" के मन्त्रों का जाप व साधना नित्य करनी चाहिए। जिससे अखंड धन लाभ व स्वर्ण की प्राप्ति होती है।

७) ये समस्त प्रयोग शिव आधीन है व श्रीविद्या के अंतर्गत आते हैं। इसलिए आपको देवक्रम का ध्यान पूजन भी करना होगा जैसे की देवी महालक्ष्मी जी का पूजन, श्री गणेश जी का पूजन, श्री कुबेर जी का पूजन आदि। "कौलान्तक सम्प्रदाय" में शिव के रूद्र स्वरूप की कुल्लुका का कुलाचार विधि से शिरोस्थापन किया जाता है। याद रहे की यदि आपको कभी शैव और शाक्त दो पारद और रसायन सिद्धांत मिलें तो आपको शैव सिद्धांत को ही प्रमुखता देनी चाहिए। क्योंकि शक्त मत में दैत्य मत भी मिश्रित है जो आपको कभी भी हानि पहुंचा सकता है। किन्तु "कौलान्तक संप्रदाय" के साधक दोनों को करने के सर्वथा योग्य है क्योंकि ये ज्ञान "गुरु शुक्राचार्य" द्वारा कौल मत को दिया गया है।

८) जब भी आप पारे को ठोस करें तो सबसे पहले "पारद शिवलिंग" नहीं बनाना चाहिए, क्योंकि पारद शिवलिंग को पूर्ण विधि व समय, काल गणना व शिव वास के अनुसार बनाना चाहिए। अन्यथा कभी भी पारद और रसायन के क्षेत्र में सफलता नहीं मिलेगी। ये अमोघ वचन है।

९ ) पारद विज्ञान और रसायन में "ईशपुत्र-कौलान्तक नाथ" को भैरवी मृगाक्षी जी व उनके दिव्य गुरु "श्री सिद्ध रसेश्वर नाथ जी महाराज" से भी अनन्य ज्ञान प्राप्त हुआ है। स्वयं भैरवी मृगाक्षी नें  "गुह्य मुद्रा पारद" बना कर "कौलान्तक पीठाधीश्वर महायोगी सत्येन्द्र नाथ जी महाराज" को दिया है कहा जाता है की इसका प्रयोग विपत्ति काल में करने पर "ईशपुत्र" संसार की किसी भी स्त्री से मनचाहा कार्य करवा सकते हैं। लेकिन ये सिद्ध पारद "ईशपुत्र" नें हिमालय की गुप्त गुफाओं में योग्य समय के लिए छुपा कर रखा है। ऐसी कथा और मान्यता "कौलान्तक सम्प्रदाय" में प्रसिद्द है 

१०) याद रखें की इस विद्या के बहुत से मंत्र है जो की कौलक्रम, चीनक्रम, समयक्रम, संहारक्रम, अघोरक्रम सहित वामक्रम आदि अनेकों क्रमों में विभक्त है। योग्य गुरु ही इसे जानता है व बता सकता है। प्राचीन हस्तलिखित पांडुलिपियों में व भूत लिपि सहित टांकरी लिपि में इसके बहुत से विधान, प्रयोग व मंत्र वर्णित हैं। इस ज्ञान के अभाव में बेचारे दीन-हीन साधक संस्कृत के स्तुति स्त्रोतों से काम चलाते हैं जैसे की श्री सूक्त, सुवर्णधारा, कनक धारा स्तोत्र आदि आदि व ऐसे निम्न याचक मंत्रो से पूजन करते हैं जो की भिखारी वृत्ति के होते हैं अथवा अच्छी भाषा में कहा जाए तो दास भाव के होते हैं जैसे यशम देहि, धनम देहि, सौभाग्यम देहि आदि-आदि। पारद और रसायन याचना का नहीं वीर भाव का विषय है साथ ही इसमें कुबेर, लक्ष्मी की प्रधानता नहीं वरन माँ योगमाया शक्ति के "रसेश्वरी स्वरूप" की ही प्रधानता रहती है और उनकी साधना की जाती है।

११) यदि आपको सौभाग्य से "रसेश्वरी मंडल व आवरण पूजा" का अवसर मिल जाए, तो जानना चाहिए की आप वास्तव में पारद विज्ञानी व रसायनी साधक होने के लायक है व एक दिन अवश्य रसेश्वर बन पायेंगे। आपकी श्रद्धा, भक्ति व ईशपुत्र के प्रति एक अखंड निष्ठा आपको सर्वोच्च बना कर ही रहेगी तो पारद और रसायन एक भाग भर ही हैं।

इस तरह ये तो केवल एक झलक हमने यहाँ प्रस्तुत की है लेकिन ये बहुत गंभीर, बड़ा और रोमांचक है। समझ नहीं आता की इसकी शुरुआत कहाँ से की जाए। लेकिन जब स्वयं "ईशपुत्र" हैं तो इसकी चिंता हमें नहीं करनी चाहिए। भारत की अति दुर्लभ विद्या को सीखना व ऋषियों के अद्भुत ज्ञान से परिचित होना अपने आप में बड़ी संपत्ति है। यहाँ अब हम इससे अधिक नहीं बताने वाले क्योंकि ये वेबसाईट सार्वजनिक मंच है और इस ज्ञान पर केवल सर्वोच्च अवतारी साधकों का ही अधिकार है अन्यों के लिए इसकी कथा सुनना ही पाप नाशक माना गया है। शिव के ज्ञान पर उनके निरंकुश साधकों का अधिकार होता है और मातृभूमि के तेज से ये विद्या सीखने का महाअवसर अब आपके सम्मुख है। तो बोलो "जय भोले नाथ-सदा हमारे साथ"
-कौलान्तक पीठ टीम-हिमालय।

इस साधना में योग्यता व पात्रता हेतु आपको "स्वर्णाकर्षण भैरव" के मन्त्र का रुद्राक्ष की माला पर उन्नीस माला का मंत्र जाप करना होगा। ये मंत्र इस पेज पर बने "ईशपुत्र व स्वर्णाकर्षण भैरव" के चित्र के नीचे लिखा गया है। इसे हेडर और फुटर चित्र पर देखें व इसका जाप तुरंत शुरू कर समाप्त कर दें व शिविर स्थल तक पहुँचने तक मानसिक रूप से जपते ही रहें। आपको साधना में अवश्य सफलता मिलेगी।

('कौलान्तक पीठाधीश्वर महायोगी सत्येन्द्र नाथ जी महाराज' द्वारा निर्दिष्ट है की सभी साधक नियमों का कडाई से पालन करें व शिविर सत्र के दौरान मोबाइल फोन का प्रयोग न करें। प्रश्न केवल प्रश्न सत्र के दौरान ही पूछे जा सकेंगे। अन्य समय में साधकों को जिज्ञासा व प्रश्नोतरी की आज्ञा नहीं होगी।)
 

'कृपया दीक्षा लेने वाले व शिविर में उपस्थित होने वाले साधक निम्न नियमों को भली प्रकार समझ लें'

१)'दीक्षा' व्यापक अर्थों वाला शब्द है. किन्तु गुरु से जुड़ जाने कारण को प्रधानत: 'दीक्षा' कहते हैं. 'दीक्षा' कई प्रकार की होती है. 'दीक्षा' का सूक्ष्म अर्थ ये भी होता है की यदि गुरु तपस्वी हो और चौंसठ कला सम्पूर्ण हो तो उसकी तपस्या का अंश शिष्य को भी मिल जाता है. किन्तु 'दीक्षा' प्रबल भाव होने पर ही संपन्न होती है. कहा जाता है कि 'दीक्षा' और साधना, 'अमृत' जैसा पदार्थ है किन्तु दोनों पात्रों का ठीक होना जरूरी है अर्थात गुरु 'योग्य' हो और शिष्य भी 'योग्य' हो. दिव्य साधनाएँ व दीक्षाएं चरम पर ही फलीभूत होती हैं. 'दीक्षा' ही धर्म के आगे बढ़ने का आधार है. 'दीक्षा' साधारण से ले कर 'ब्रहमपात' से भी ऊपर तक जाती हैं. ये तो आपके और गुरु के सामर्थ्य पर निर्भर करता है कि आप कहाँ तक की अनुभूति पाते हैं. सबसे बड़ी और अतार्किक सी जान पड़ने वाली मान्यता है कि 'दीक्षा' किसी आम आदमी को साधारण से ले कर 'महामानव' तक बना सकती है. 'दीक्षा' से कोई ऐसा दुःख नहीं जो नष्ट न हो. पर नियम वही है कि इसके लिए पात्र और आध्यात्मिक बुद्धि का होना जरूरी है. साथ ही नियम विशेष कि 'कलिकाल' में सभी 'दीक्षा' के योग्य नहीं जैसा की प्राचीन काल में था. जब मनुष्य अहंकार से ऊपर.........दोषारोपण की निम्न वृत्ति से ऊपर.....भौतिक तार्किक बृत्ति से ऊपर जाए, तो ही ये संभव है. ऐसा होना 'कलिकाल' में संभव नहीं, क्योंकि जहाँ सर्वत्र 'धर्म' को 'व्यापार' बना दिया गया है और 'कपटी कालनेमियों' नें डेरा जमा रखा है. ऐसे में संदेह होगा ही...और वहीँ 'दीक्षा' फल नहीं दे पाएगी.....ये बड़ी ही 'धर्मसंकट' वाली स्थित है कि क्या किया जाए....तो केवल प्रारब्ध को आधार मान कर 'योग्य गुरु' और 'योग्य दीक्षा' की कामना करनी चाहिए.......जगत बनाने वाले 'नियंता' को आपकी भी चिंता अवश्य होगी. भारतीय ऋषि परम्परा के अमूल्य ज्ञान से 'दीक्षा' जोड़ती है.....कितु हम आपसे प्रार्थना करते हैं कि बिना जाने....बिना कसौटी पर कसे 'दीक्षा' न लें या आपकी 'भावभूमि' यदि ऐसी नहीं है, तो भी ऐसे प्रपंचों से दूर रहना ही अच्छा होता है. "कौलान्तक पीठाधीश्वर" साधकों को बहुत सी 'दीक्षाएं' देते रहते हैं, जिसका कारण है कि सौ में से सत्तर या अस्सी साधकों पर तो 'दीक्षा' फलेगी और उनका आध्यात्मिक विकास होगा. आप यदि 'अध्यात्म' को जानते हों और 'देहानुगत गुरु' से नहीं बल्कि 'ज्ञान गुरु' से जुड़ने का मादा रखते हैं, तो आपको चाहिए कि 'धर्मानुसार गुरु दीक्षा' अवश्य प्राप्त कर जीवन को 'निगुरा' होने से बचाएं. ये जरूरी तो नहीं कि आप 'प्राचीन धर्म' और 'परम्पराओं' को माने ही. किन्तु यदि आप उनमें 'सार तत्व' पाते हैं, तो उनसे दूर रहना मूर्खता होगी. इसलिए समस्त बातें सोच कर तार्किक-अतार्किक दृष्टि से निर्णय कर लेने पर ही 'दीक्षाएं' लें. 'कौलान्तक पीठ' आपको 'दीक्षा' लेने व 'साधनाएँ' करने के लिए किसी प्रकार का 'भय' नहीं दिखता, न ही आपको 'लालच' देता है व प्रेरित करता है. हम विश्वास करते हैं कि जो काँटों के मार्ग पर चलने वाला होगा, जिसकी परम आध्यात्मिक बृत्ति होगी व 'ईश्वर इच्छा' होगी वही 'दीक्षा' प्राप्त कर इस मार्ग को 'सिद्ध पंथानुसार' स्वीकारेगा.


२)'दीक्षा' लेने का वास्तविक नियम तो ये है कि घर का गृहस्थी का त्याग का 'गुरु' की वर्षों सेवा करे. उनके लिए 'भिक्षा' मांग कर लाये और वही 'भिक्षा' 'गुरु' को अर्पित करे. 'गुरु' की 'चरण पादुका पूजन' करते हुए तेल आदि से गुरु की 'सेवा' मालिश कर उनके 'वस्त्रों' को बिधि पूर्वक साफ कर 'गुरु' के 'भोजन विश्राम' आदि की व्यवस्था साधक करे. 'गुरु' को किसी भांति कष्ट न पहुंचाए. 'गुरु' को ही इष्ट व 'शिव' मानें.'गुरु' की व 'शिव' की 'निंदा' न सुनें न करें. करने वालों से 'सख्ती से निपटे' जिसके लिए 'गुरु' से 'युद्ध कौशल' आदि 'विद्याओं' को सीखे व समय पर 'दुष्टों' व 'धर्म का विरोध करने वालों' पर इसका प्रयोग करे.'ज्ञान से' 'तर्क से' 'विवेक बाहुबल से' 'धर्म विरोधियों' का सामना करें. योद्धा साधुओं का सम्मान करें. सिद्धों का आचरण करें.गुरु मार्गी 'ज्ञान मार्गी' हों......आदि...अदि....अनेक बाते हैं, जिसे जान कर 'आम आदमी' तो भाग खड़ा होगा......इसलिए आज के समय में ये सब तो संभव नहीं है. क्योंकि परिवेश बदल गया है. लड़ने की जरूरत नहीं क्योंकि 'लोकतंत्र और क़ानून व्यवस्था' आपकी व आपके 'धर्माधिकारों' की रक्षा करती है. आज लोग अपने 'माता-पिता' के चरण पानी से नहीं धोते उनकी बृद्ध होने पर 'सेवा-मालिश' आदि नहीं करते, तो 'गुरुओं' की बात कोसों दूर हैं. यदि कोई करेगा भी तो अन्य 'बेतालादी' सहन नहीं कर पाएंगे.....ऐसे में क्या किया जाए? तो केवल इतना ही पर्याप्त है कि आप गुरु के प्रति श्रद्धा भाव रखें, सामर्थ्यानुसार 'दक्षिणा' आदि दे कर उनसे 'दीक्षा' के लिए प्रार्थना करें.यदि आप धन हीन है तो 'गुरु के चरणों' में निवेदन करें. वो तो दुःख को जानने वाले है. आपको भी कृपावश अनुग्रहित अवश्य करेंगे. यदि आपमें पात्रता हो तो 'गुरु' आपकी स्थित,आयु,लिंग,वर्ण,जाती,रंग,देश काल,स्वास्थ्य,व्यवसाय आदि नहीं देखते, वो तो केवल आपको सीने से लगा लेते हैं. धन्य हैं ऐसे साधक, जिनको 'गुरु' अपने सीने से लगा कर अपना स्नेह प्रदान करते हैं. आपको भी सरल नियमों का पालन करके ही 'दीक्षा' लेनी चाहिए व साधना मार्ग में आगे बढ़ना चाहिए.हमें ख़ुशी होती है कि प्राचीन काल से ही जब विश्व कुछ भी नहीं जानता था तभी से 'गुरु-शिष्य' का सम्बन्ध आज 'घोर कलिकाल' तक चल रहा है. 'दीक्षा' लेने के अनेक 'शास्त्रीय व पंथानुसार' नियम हैं पर सामर्थ्यवान गुरु के लिए ये 'नियम' गौण ही होते हैं.


३)"'दीक्षा' की 'दक्षिणा' चढ़ावा आदि"-जैसा कि पहले ही बताया जा चुका है कि इस युग में एक नहीं अनेकों 'कालनेमि' हैं जो 'हनुमान' जी को भी धोखा देने में कामयाव रहे....फिर आप और हम क्या है? हमारे धर्म और उसकी 'सनातन परम्पराओं' को नष्ट करने का 'दिन-रात' अविरल प्रयास सदियों से जारी है. अब तो नौबत यहाँ तक भी आ गयी है कि 'धर्म प्रमुखों' के शिष्यों के बीच प्रायोजित 'कालनेमियों' को भी भेजा जाने लगा है ताकि 'धर्म' का समूल नाश हो जाए और सनातन अपनी जड़ें खो जाए। इसलिए 'कालनेमियों' से सविनय प्रार्थना है कि न तो कोई 'दक्षिणा' दें, न ही कोई चढ़ावा चढ़ाएं, न ही पीठ के किसी कारण से जुड़े......या हमारी मान्यता को मानें। हम किसी भी व्यक्ति, संगठन आदि के 'तर्क का प्रतिउत्तर' देने के लिए विवश नहीं हैं व सभी कानूनी समस्याओं हेतु केवल 'हिमाचल प्रदेश शिमला न्यायलय' ही मान्य होगा। दक्षिणा धन व्यवस्था व घोषणाएं 'कौलान्तक पीठ' करती है न कि 'कौलान्तक पीठाधीश्वर महायोगी सत्येन्द्र नाथ जी महाराज'. ऐसे में कोई भी 'विवाद' होने पर उसका उत्तर केवल पीठ के 'प्रतिनिधि' ही देंगे व कानूनी समस्याओं का निपटारा भी 'अधिकृत व्यक्ति' ही करेगा. तत संबंधी सभी विवादों के लिए भी वही 'अधिकृत व्यक्ति' ही उत्तरदायी होगा. सबसे बड़ी प्रार्थना कि भले ही हमें हमारी 'पीठ' को धर्म प्रसार के काम काज व विराट कार्यों के लिए बड़े धन कोष की आवश्यकता है. पर आप न ही दें तो अच्छा होगा. 'दीक्षा' निशुल्क नहीं दी जायेगी क्योंकि ये हमारे व 'महायोगी जी' के समय का 'दोहन' करती है व 'व्यवस्थाएं' करनी सरल नहीं होती. 'पीठ' के नियम 'महायोगी जी' पर लागू नहीं होते. वे यदि अपनी कृपा से किसी को भी 'निशुल्क दीक्षा' देते हैं तो हम उस स्थिति में 'मौन' हैं. हमारा प्रयास 'धन संग्रह' का भी रहता है क्योंकि हमारा उद्देश्य 'कौलान्तक पीठाधीश्वर' के ज्ञान को संजोना, संस्कृति के लिए काम करना व उसका प्रसार है. साथ ही हम नहीं चाहते कि 'महायोगी जी' जिनको हम प्राणों से भी अधिक चाहते हैं वो संसार में 'अव्यवस्था' में फसे रहे. हालांकि उनके लिए अव्यवस्था कुछ भी नहीं होती वो काँटों पर सोने वाले, बर्फ पर चले वाले, आग्नि के निकट रहने वाले हैं, भिक्षा वृत्ति जिनका स्वभाव है ऐसे पुरुष के लिए भला हम क्या चिंता करेंगे? किन्तु कर्म कहता है कि 'गुरु सेवा' ही आधार है. इसलिए 'धन' का हम प्रयोग करते हैं और योग्य साधकों से अनुरोध कर 'योग्य धन' द्वारा 'गुरु' की व 'धर्म' की अपने विवेकानुसार 'सेवा' करते हैं. 'दीक्षा-दक्षिणा' आदि के धन का हम क्या करते हैं? ये हमारा या 'पीठ' का निजी मामला होता है, इसके बारे में हम किसी को कुछ नहीं बताते. जो की पूर्णतया 'संदेह जनक' है इसलिए 'धन' आदि सोच-समझ कर ही दें या न दें.


४)'कौलान्तक पीठ' का प्रमुख उद्देश्य 'सनातन' का विकास है, परम्पराओं का संरक्षण व संवर्धन है. हम 'हिन्दू धर्म' का प्रचार व प्रसार करते हैं. व विश्वास करते है कि 'महायोगी जी' एक 'अलौकिक' 'अवतारी' पुरुष हैं जो कि कौलान्तक साम्प्रादाय की मान्यता व हमारा विश्वास है. उनकी 'अलौकिकता' के लिए हम किसी 'चमत्कार' को समर्थन नहीं देते व न ही आपको कहते हैं कि वो 'चमत्कारिक' हैं. हम 'शिष्य' हैं 'शिष्य' के लिए 'गुरु' 'भगवान् स्वरूप' होते हैं, इसलिए हम सदा उनकी बडाई करते हैं. हालाँकि 'कौलान्तक पीठाधीश्वर महायोगी सत्येन्द्र नाथ जी महाराज' कहते हैं कि उनमें अभी बहुत सी कमिया हैं, वो एक आम आदमी से बढ कर और कुछ भी नहीं हैं. किन्तु 'पीठ' विश्वास करती है कि वो एक 'महामानव' हैं, उनका जन्म 'प्रायोजित' है, वो 'सिद्धों की भविष्यवाणी' के अनुसार पैदा हुए हैं. वो एक गुरु नहीं बल्कि 'अवतार' है। वो दुखों, आलोचनाओं, अपमान को सहने व मानव को मार्ग बताने के लिए जन्में हैं। उनके 'दिव्य गुरुओं' नें उनको 'विश्व के दुःख' हरने के लिए तैयार किया व भेजा है. वो 'परम मायावी व सिद्ध' है. उनकी कमियां हमें नजर नहीं आती और न ही हम देखना व जानना चाहते हैं, क्योंकि वो 'देहानुगत' है. हम उनको 'तात्विक' रूप से पूजते हैं. उनसे 'बैर' रखने वाले व उनके विरुद्ध 'षडयंत्र' रचने वाले हमें रोज कोई न कोई झूठा तथ्य या विचार भेजते हैं. हम उनके 'आभारी' हैं कि वे अपनी जिंदगी का इतना समय 'महायोगी' जी के विरूद्ध सोचने में इस्तेमाल करते हैं. किन्तु इन सबसे 'हममे' और हमारी 'मान्यताओं' में अंतर नहीं आएगा. क्योंकि केवल हम ही उनको सबसे निकट से और सटीक तरीके से जानते हैं. हमारे लिए वो एक ऐसे 'पुरुष' हैं जिहें हम हर रूप में केवल 'प्रेम' करना चाहते हैं. इसलिए हम 'अतिश्योक्ति' पूर्वक उनकी 'बडाई' करते हैं. आपको चाहिए कि 'बुद्धि' और 'विवेक' का साथ ले कर ही तथ्यों पर चलें. हमारी मान्यता 'अवैज्ञानिक' हो सकती हैं और बहुत सी जगह है भी, पर हम फिर भी 'विचार' और मान्यताओं पर 'दृड़' हैं. इसलिए आप केवल उतना लीजिये जो आपके 'योग्य' हो. 'महायोगी जी' तो 'अथाह समुद्र' है. किन्तु उनकी बडाई यही है कि उनसे सरल कोई दूसरा नहीं मिल सकता. आप उनको 'गुरु' या 'इष्ट' के रूप में मान सकते हैं किन्तु उसके लिए 'तात्विक बुद्धि' रखें. विश्वास से 'महायोगी' शीर्ष पर पहुंचे हैं। आपका विश्वास ही आपको भी आगे ले जाता है। यदि आप इन सब बातों को जानने के बाद भी 'पीठ' से जुड़ना चाहते हैं और 'महायोगी जी' के पथ का अनुसरण करना चाहते हैं तो ये 'अद्भुत' ही होगा। ऐसे में 'हम' और 'कौलान्तक पीठ' आपका हार्दिक स्वागत हैं.


५)'शिविर' में आने वालों के लिए 'लाल रंग' की धोती व लाल ओढ़नी, कौलान्तक भेषभूषा आदि अनिवार्य होगा. गले में 'रक्त चन्दन' की 'माला' व मंत्र साधना के लिए छोटे दानों वाली 'रुद्राक्ष माला' आदि हो. आवश्यक बातों को लिपिबद्ध करने के लिए 'डायरी-पेन' आदि साथ रखें. शिविर के दौरान 'निजी फोटोग्राफी' और 'विदिओग्राफी' पूर्णतया वर्जित होगी. 'मोबाइल' जैसे आधुनिक 'कर्णपिशाचिनी यन्त्र' आदि 'मूक' अवस्था में रखें. आपकी सहायता के लिय 'कौलान्तक पीठ टीम' उपलब्ध रहेगी. 


६) 'रसेश्वरी साधना एवं पारद विज्ञान दीक्षा' साधना शिविर की दक्षिणा 3600/-रुपये देने पर ही दीक्षा प्रदान की जायेगी. किन्तु पुराने साधकों के लिए ये शुल्क कम होगा यानि की 3000/-रुपये। आप दीक्षा राशी अग्रिम जमा करवा कर अपना पंजीकरण क्रमांक भैरव पुरुषोत्तम जी महाराज से प्राप्त कर सकते हैं। हम आपसे एक बार फिर अनुरोद्ध करते हैं की केवल साधना जगत की गहरी पकड़ और विश्वास रखने वाले साधक-साधिकाएँ ही भाग लें। ये कोई जन-सामन्य हेतु आयोजित सत्संग शिविर नहीं है। आप दीक्षा हेतु इस आन लाइन अकाउंट का प्रयोग कर सकते हैं। किन्तु 
आपको ध्यान रखना होगा की आप 
केवल
 और केवल इसी अकाउंट का प्रयोग करेंगे किसी दू
रे अकाउंट का प्रयोग पूर्णतया वर्जित है। कृपया इसका कड़ाई से पालन करें अन्यथा आपको इस साधना से हाथ धोना प
 सकता है। पीठ द्वारा अधिकृत अकाउंट की डीटेलइस प्रकार है-

HDFC Bank
Manjusha Savesh
AC.No.-14081000012606
IFSC code-0001408


जानकारियों के लिए सम्पर्क करें-

Contact No-

पुरुषोत्तम भैरव जी महाराज-09866513332

बालीचौकी आश्रम-01905229133


(कौलान्तक पीठ हिमालय साधकों को कौलान्तक पीठाधीश्वर महायोगी जी के पावन सान्निध्य का लाभ उठाने का अवसर प्रदान कर रहा है..आइये रहस्य पीठ के योगियों की निकटता को अनुभव कर जीवन को गौरवान्वित करें-'रसेश्वरी साधना एवं पारद विज्ञान दीक्षा' साधना शिविर 20 और 21 जुलाई 2013)
                                                          
                                                                     -कौलान्तक पीठ टीम,हिमालय
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 


                        Moksha Sadhana Shivir
 
Kaulantak Tradition takes another unique step forward. This is the reason why people react to  hearing name of Kaula Tantra as if they have heard secrets of hidden treasure beneath the surface of earth! But Kaulantak Peeth is not a new Dharma or new chapter. Rather, this is the highest level- peak of spirituality. Just like a small child first attends small classes then slowly moves on to higher level classes and at the end receives the highest level class. Similarly, an ordinary sadhaka first does jaap of simple and small mantra, takes various names of the lord, sings and composes bhajan, approaches gurus and temples, listen to their sermons, then become disciple of some guru, read scriptures, indulges in debates and discussion thereof. Such a preliminary stage sadhak swings between theism and atheism. He practices various spiritual discipline, and slowly starts to rise above all this. Now vedanta is not sufficient for such a sadhaka. That sadhaka now yearns to go beyond Geeta, Ramayana, and other puranas like Bhagvata Purana. Sadhaka then does not want to limited to Murti/idol worship, instead that sadhaka wants to stretch to the infinite. Then on this planet, that sadhaka can only find one such great school to satisfy his/her longings to touch infinity in spiritual practices. And that school is Kaulantak Peeth. The most mysterious and secretive seat of knowledge of Himalaya. A Peeth which has been present since time immorial, is present today and will be present till the end of time. A peeth which is not visible but is ever present. Many a theist and atheist, along with several intellectuals took birth and died but could not even obtain inkling of secrets of this great mysterious peeth. Who know from where and when a person is selected by Yogis of Himalaya and attracts that person towards them. Predicting this is very difficult. Today the web of science and logic has pervaded the planet, where so called media and reports with low mentality are working against culture and dharma. Even though outward appearances are all motivated and controlled by dharma opposing and mleccha forces, Himalaya calls sadhaka towards itself. And such a sadhaka listening to the inner voice of the soul, comes out in search of Himalaya. Is this miracle not happening everyday? After all where is the principle behind this? What is happening in the subtle realms? Who is guiding this axis? Corrupt police and human rights violating administration has spread such a web everywhere which is curbing freedom all the time and an ordinary person is so must lost in this myriad system that with so many laws imposed on every small events and activities that freedom has been reduced to just its namesake. But even in these adverse circumstances, a great man of the millennium awaits, to take you away from this worldly strife and give you knowledge of supreme path. Who nourishes you with his prana. Ishaputra, who bestows his grace on all without discriminating based eligibility and ineligibility  who takes on himself various afflictions for his sadhakas, who holds in his heart all the sadhaka walking behind him. Few great sadhakas are enjoying supreme company of that  Infallible personality. But it appears that not everyone is able to comprehend his true form and not able to enjoy the closeness. Well, lets leave this and come straight to the point that after ions and eras of time this planet is experiencing such novel grace showered by Kaulantak Nath. From the inexhaustible store of knowledge of Rishis and of MahaHimalaya, Kaulantak Nath brings forth a unprecedented sadhana which is known as 'Moksha', a secretive spiritual practice in series of mystical sadhanas. A sadhana which is an aspiration of all great sadhaka and sadhakas who are not able achieve it because of their misfortune, wish they could at least catch a glimpse of it . But, most capable Ishaputra out of his mercy is giving this sadhana to sadhakas. It appears that Ishaputra is attempting to repeat the SatYuga of rishis and munis again on this planet. Yes, we know you are in hurry to know about when and where this sadhana will be conducted. But have some patience since in hurry one must not loose important essence. As we have mentioned earlier, this sadhana is not for ordinary sadhakas. So evaluate your level of sadhana as to where you stand. We also know no body measures oneself any less than an avatar! So first, please answer the following questions.
1) Do you know about kaulantak Peeth that this Peeth is known by various names like MahaHimalaya, Himalaya, Divine land, Divya Bhoomi, Gyan Ganj, Siddhashram,  SiddhaBhoomi, NeelKshetra, Aavaran Bhoomi, Rahasya Peeth, Shambal, Shambhal, Shangri-la, DevBhoomi, Agochar Grh, Sookshma Peenda etc etc? If yes then how many of the aforementioned names have you heard and have information about?
2) Do you know about descent of divinity in ordinary folks, Avatar, IshaPutra, divine messenger, great inspiration, great ascended masters and  mystics? If yes then how much you believe in reincarnation and life after death? Do you only salute miracles or can you look and think beyond miracles?
3) Are you aware of obstacles and complexities coming in way of supreme penance and great sadhanas? Are you capable to face and solve obstacles that will arise in this upcoming sadhana? If yes then get prepared, great difficulties and obstacle will present themselves in front of you for this sadhana. If you can fight them then you will accomplish this sadhana successfully!
4) Do you have control over your sleep? Can you overcome laziness?  Are you capable? Do you have courage and greatness to do service? Do you have strength to fight opposing circumstances  thoughts and falsity? Do you feel attracted towards Himalaya. Do you experience some divinity when you look at mountains? Can you stand with the Peeth in difficult times? If yes, then you can get entry. 
5) Do you know about Yoga, Mantra, Tantra, astrology, Ayurveda, rituals and other such subjects? Do you have information about rajas path of Kaulacharis? Such kaulacharis who oppose animal sacrifice and other such negativties like consuming alcohol and meat? Do you know about Kulachaar which is tantra based on yoga? Do you have information on three gunas- sattva, rajas and tamas? Do you understand what it means to go beyond the three gunas? That too in two different ways- one inclusive and another exclusive? If yes, then look at the next question.
6) Do you experience oneness in rituals and yoga and other spiritual practices? Do you feel and understand all these different practices to be connected together in a rhythm and being synonym of each other?  Do you know why continuous spiritual practice is necessary? Can you move beyond attachment to experiences and learning during spiritual practice? Are you a strong fighter in terms of physical and mental fitness? If yes then great!
7) Do know experience difference between siddhi and miracle? Do you understand dharma and spirituality beyond science and its boundaries? Do you experience divine guidance every moment? Do you know difference between  belief and blind-belief? Are you above world and worldly talks, praise and insults and conspiracies? Are you free from fear, shyness and hatred? Do you know about the importance of tradition of gurus?  Are you prepared to undergo difficult tests? If yes.....
Then you can proceed further to know about important details about the present sadhana.
If your answers are in negative, then please stay at you home and enjoy the world around you! Because what is there on Himalaya and mountains? Sadhana can happen in home too! There is no hidden magic in mountains which you will get. Stay home, enjoy chaat-pakori, in comfort of home enjoy TV-internet, post some comment on somebody, and if possible say Jai Bholenath a few times in a day! That's it, this is sufficient in life. For you even this would be a big accomplishment. 
If your answers are in positive, then start practicing yogasana, pranayaam. Make yourself strong and hard. Start doing mantra jaap. Because there is a lot of mantra jaap to be done which will not get complete and if it doesn't get complete, sadhana will also not happen. For this sadhana, first prepare your heart, then your body and then convince your intellect. You have to live in difficult environment. And you have stay quite. You have to stay in between mountains where you won't find any shop or shopping malls for a long distance. You won't get tea or murabba!  You will have to accomplish this sadhana on sattvic, pure food and in less quantity. Begin praying to your Ishta Deva and ancestars to bless you to be able to get entry and to accomplish this sadhana. Since new sadhaka and sadhikas will not have full information so let us state here that this sadhana is third and final phase of Shivatva Sadhana. The first phase of this sadhana was held under name of "Shivatva", which nobody in future will be able to get.  Second phase was conducted under name of "Pancha Kosha Gaman", which may be conducted again in future. Now in this series the third and extremely important phase is being conducted which is known as "Moksha". One who accomplishes all three phases can only be called enfused with Shiv essence and become Shiv i.e. merged in Shiv.  But scriptures and hidden tradition says that this sadhana cannot be accomplished easily without difficulties. Uptil now, the first two phases got over through grace and effort of "Ishaputra". But this time, "Kaulantak Nath" himself is saying that troubles and difficulties will present themselve. So in such circumstance, it depends on you as to what you decide. And how you will accomplish this phase. Although Kaulantak Peeth Team knows that you are siddha sadhaka and filled with amazing capabilities and face all challenge with great strength but this time matter is even more serious so please prepare yourself accordingly. 
It is not necessary for us elaborate on meaning of word 'Moksha' as you all are aware of it. In path of evolution, one reaches such a state inside that the world cannot hold him or her. His mind doesn't stay in worldly activities. Even after doing everything in the world he feels he is not the doer. The world doesn't see any difference in him from outside and finds him similar to itself but such a person is not what appears to be in the mirror. He starts to feel that if some divine personality or consciousness comes in his life then he would surrender completely and give his whole life!  Life gets entangled in such lifeless state which psychologists wrongly diagnose as mental disease and gives their own concocted theories!  Actually because of sadhana bhakti of this life, result of serving guru etc or because of prarabdha of previous births one reaches such a supreme state of detachment. But that person doesn't become aware of such reasons behind his change of perspective in life. In such situation,  that person needs a path that will take him or her forward towards completeness. So this path and sadhana to accomplish this completeness in Kaulantak tradition is known by name of 'Moksha'.  This sadhana is primarily yoga based and tantra based but is accomplished using rituals (KarmaKanda). Through path of rajas in kaulantak tradition this sadhana is accomplished through 'Mishrachaar'. But since time immemorial this sadhana is done on peaks of mountains and other hidden places in mountains. There is a strong rule not to divulge information about this sadhana and location of this sadhana. Because of this how this sadhana will be conducted is a big question. Along with it, there is need of large sum of money for this sadhana, how that much fund will be raised is another yaksha question. But come what may, if 'Kaulantak Nath' has decided then it will happen. Since this website is a public medium we won't give a lot of information here. Rather all those sadhakas who are selected for this sadhana will be informed separetely. What is this sadhana and why it is being conducted won't be told here. But to come for this sadhana what all needs to be done for prepration will be mentioned here. Please remember to follow whatever is written here fully.....we reiterate, whatever is written here should be followed completely. Do not rely on anybody's opinion rather follow the words written here fully. But please know before coming the following...
1) During sessions of the shivir, it is not only forbidden to indulge in gossips or casual chats,  but will be considered as serious crime!
2) Please occupy your place before 'Kaulantak Nath' and have your worship articles beforehand. Nobody will be allowed to get up during session. 
3) We are not worried about mobile phone since there won't be signals there for miles around!
4) Please bring a separate bag for Trash like envelope, packets, paper, wrappers etc. Collect all such trash and we will dispose of them later on after returning from shivir.
5) There won't be proper bathroom or toilet facilities. So such person should not come who is not accustomed. You will have to take bath in cold river water. Sunbeams would be very strong and sharp, skin might get burned because of cold weather and extreme sun so keep your skin protection with you like creams, Vaseline etc.
6) Since this sadhana is secretive, so do not bring anybody with you for this sadhana. This might disqualify you from the sadhana. Do not forget to bring warm clothes, sweater with you. Living arrangement will be in tents, for example please refer to Vaishvik Bhairav sadhana video on youtube.
7) If possible leave your house alone and inform only member of the Peeth after leaving your house. Return back home too alone. So that life of solitude can be accomplished at least symbolically. Please do not indulge in junk foods like gol gappa, chaat, cola etc during journey.
8) Do not tell anybody except your family as to where you are going and why. Please keep official govt issued ID proof with you.
9) During shivir you have to keep fasting each of the two days, you will get food only in the night. So for eating keep dry fruits and sweats with you.  You can also keep thermal flask and sugar cubes, milk powder with you.
10) You will have to bring deep red colored dhoti and cloth for upper body. This red cloth must have yellow border. Pooja plate (thali), pancha patra, rudraksha maalaa- one for wearing, and one for jaap. Bring a mat for sitting and for yogasana. Please remember Kaulantak Peeth team won't be able to help you on this matter which we regret. So please come fully prepared from home. On way to shivir location and at shivir location there won't be any time nor any shops for such articles.
11) If some aged sadhaka or women are attending the shivir, then Kaulantak Peeth team would be always ready for their service and assistance  If children are attending, which is unlikely, but arrangements would be made in such a case. It is important to mention here that morning bath will be a team bath where everyone will take mantra bath at river bank where Kaulantak Nath will also himself take bath. Therefore, it is requested to all sadhakas to bring a red dhoti for bath. Women too should bring appropriate clothes for punya bath.
12) All sadhakas should bring sleeping bag with them or they can pay 5 days rent in advance to Swami Krishna nand ji who will arrange the same. Since this sadhana is very important so please verify that no important article is forgotten. It is difficult shivir but not so much so that you become afraid. If you believe in Shiv and Ishaputra then all is possible. Just do the necessary preparations.
13) For  you personal photography, we will try to give extra time. Please remember to use handkerchief for sneezing and coughing. And remember not to make noise.
Before coming to the shivir you will have to do 'Panchopchaar' pooja of Bhagwaan Shiv. For pooja you should use MahaMrityunjaya mantra. Have a shivlinga and do abhishek. For abhishek, use "Om mahakalaya vikartanaya mayadharaaya namo namaha' mantra. Only after pooja start the jaap of eligibility mantra for the moksha sadhana shivir. Use rudraksha maaala for jaap. Keep your asana a little above the ground for jaap. Taking bath before jaap will be especially beneficial. First do one maala of gurumantra "Om sam siddhaya namaha". Then do the mantra jaap of following mantra: " Om bhoo bhuva svaha sarvaaparivetaya mahat sthitaaya hraum namaha". You have to do atlease 32 maalaa of the given mantra. It is important to tell the able sadhakas that as per shastra and rules, the required mantra jaap is 74 thousands. Rest is your wish. Do the jaap while going to the shivir location and while returning from there too.
Important note- You have to reach designated place by 9 a.m. on 7th june 2013, without failing. You will get information on designated place from Swami Krisha nand ji maharaj. You will return from shivir on 10th june 2013 evening. So arrange for return journey only after late night of 10th june. Along with Kaulantak Nath, only swami krishna nand ji and Dhian Bhairav ji has seen the location. So instead of relying on anybody's opinion, contact swami ji or sister yogini Manjusha Sarvesh ji, for any further information. Since you know that we require large funds for this shivir and since number of participants will again be kept low, the shivir deeksha amount will be high.  This will have two fold advantage.  First, selection process will be simple and second control over number of attendees. Please remember, borrowed money or money gotten by pleading others won't work. The deeksha amount must be your pure earned money. 
We again give you this formal and intellectual warning that this belief system and faith is personal matter of Kaulantak tradition. There is no relation to any other belief system or tradition. You need not agree to what we are saying nor required to attend the shivir. 
                                                      Kaulantak Peeth team - himalaya
(It is ordered by Lord of Kaulantak Peeth Mahayogi Satyendra Nath Jee Maharaj that all sadhaks strictly adhere to the rules and refrain from using their mobile phones during the shivir sessions. Questions can be asked only during fixed Question asking time, and at all other times sadhaks won’t be allowed to satisfy their curiosity on any topic and won’t be permitted to ask questions.)
'It is a request to all Sadhaks, who are either participating in the shivir or are getting initiated to properly understand the following rules'
1) Diksha or initiation means a lot of things but essentially it implies the mechanism to establish a connection with the Guru. There are various kinds of diksha. A subtle meaning of diksha also include that if the guru is accomplished with all sixty four Kalas and he has undergone penance, then the disciple also gets some amount of guru's penance. But success in diksha requires strong spiritual inclination (bhav). It is said that diksha and sadhana are similar to elixir but requires both parties to be true, i.e. a capable guru and a capable disciple. Divine sadhana and diksha bear fruits at the peak of this true alignment. Diksha is the foundation for Dharma to move forward. Diksha ranges from ordinary diksha to ones even above BrahmaPath diksha. The level of your experience will solely depend on the your capability and capability of your guru. The most prevalent belief (which even seems illogical) is that diksha can transform an ordinary man into a superman/supramental man/ubermensch. There is no suffering which cannot be alleviated by diksha. But rule again is the same that it requires one to be eligible and of spiritual mind/inclinations. Moreover, especially in this age of darkness (kali kaal) when not everyone is eligible for diksha unlike ancient times when men where above pride and negative attitudes like accusing and finding faults, such diksha become possible only when one rises above gross materialistic debating mind. This is not possible in these times of darkness where everywhere dharma has been reduced to mere business and cunning people like Kaalnemi (of ramayan era) have established themselves everywhere. This is sort of situation of crisis, therefore by keeping karmic momentum of previous births (prarabdha) ahead as foundation, one should wish for capable guru and capable diksha....the maker of this world will most certainly be thinking about one's welfare. One gets connected with the knowledge tradition of Rishis of Bharat through diksha. But we sincerely request to you that without knowing and without testing on varied parameters, do not take diksha. If your mental inclinations do not match up then also it is best to stay away from all these elaborations. Lord of Kaulantakpeeth (Kaulantak Peethadishwar) gives several dikshas to sadhaks which is based on the reason that at-least seventy or eighty percent of sadhaks will get fruits of these diksha and they will grow spiritually. If you know spirituality and desire to get connected with embodied realm of knowledge behind the Guru and not physical body of Guru then you should definitely take guru diksha as per dharmic tradition and salvage your life from going astray. It is not necessary that you believe in ancient dharma and traditions, but if you can extract the essence of it then it would be foolish to stay from them. Therefore brush aside all logical and illogical viewpoints, and then only take diksha. Kaulantak peeth neither forces you with fear to take these dikshas nor lures you with anything. We firmly believe that if one is capable in overcoming difficult circumstances akin to proverbial walking on thorns and has supreme spiritual mind then god willing he or she will get initiated and will accept this path as per tradition of siddhas.
2) In reality for taking diksha one is supposed to renounce household living and serve guru for years; gather alms for guru and offer it to guru, worship the holy feet of guru and massage his feet with oil, do his laundry and prepare his bed and resting place etc etc. Never allow any discomfort to come in guru's way. And believe the Guru to be the personal deity (Istha dev) and Shiv. Neither listen to nor indulge in criticizing guru; and deal severely with anybody caught doing such criticism and learn various skills of warfare to handle such situations and at required times use these skills on evil minded people and people who are against Dharma. Respect warrior sadhus and emulate siddhas. Follow the path of Guru and knowledge. So, there are various such traits required for diksha but in current day and age, an ordinary person will run away at such requirements. Therefore these things are not possible at present because of change in lifestyle and environment. There is no need to fight because democracy and rule of law protects you and your right to Dharma. Moreover, in present times, people don't even worship the feet of their parents or take care of them in old age, so serving guru is perhaps too much to ask for anyways! If somebody somehow gets about serving Guru then jealous, envious and devious minded people will never be able to digest such acts. So what should be done? Thence, it is sufficient that you have devotional attitude towards Guru, give dakshina/donations as per capacity and request for diksha. If you are poor then make it clear and plead at lotus feet of shree guru. Guru knows your sufferings, he will certainly grace you with his compassion and help out. If you have eligibility for diksha then guru will overlook your situation, age, sex, caste, race, color, nation, health, occupation et al, and will embraces you anyhow. Blessed are those sadhaks who are embraced by Guru and are showered with his love! You should also follow these straight forward rules and then take diksha and move forward on the path of sadhana. It gives us a lot of happiness realizing that the same Guru-disciple relationship is being continued, from the ancient forgone era when the world knew nothing to the present times of darkness. In truth, even though for diksha there are several rules as per scriptures and traditions but for a capable guru all these rules are secondary.
2) About dakshina for diksha, as it has been mentioned earlier that in this yuga, there are not one but several KaalNemis around. Kaalnemi was able to trick even Hanuman jee, so who are us! Night and day there are efforts being made to destroy our dharma and eternal traditions (sanatana parampara). It's gotten so worse that deliberate attempts are made to send such kaalnemis to leaders of dharma in guise of disciples. Therefore, it is our humble request to such kaalnemis to not give any dakshina, nor offer anything or join Kaulantak peeth for any reason...or agree to any of our beliefs. We won't be held responsible to respond to arguments of anybody or organization. For any legal disputes, only Shimla court of Himachal pradesh would be admissible and honoured. All donations, arranging funds, announcements etc are work of Kaulantak Peeth; and not of Kaulantak Peethadhishwar Mahayogi Satyenddra Nath ji. Therefore, all complications will be addressed by some representative of Kaulantak Peeth and some relevant authorized person will handle any legal troubles and that authorized person will only be responsible for any controversy. It is an intense request to all that we really need large corpus of fund for work of Peeth to spread the knowledge of Dharma and other such grand works. However we still say that you don't give anything. Remember dikhsa won't be given free of cost because it is using our time and time of Mahayogi ji. Moreover, it is not simple task to make arrangements for shivir. Mahayogi ji is not bound by rules of Peeth. However we are silent spectator in such cases when out of his own volition and grace Mahayogi ji decides to give dikhsa without any fee to someone. Our effort also involves collecting funds too because our aim is to compile and preserve knowledge of Kaulantak Peethadhiswar, and to work for and spread the culture (sanskruti). At the same time we don't want Mahayogi ji whom we love more than our life to be entangled in worldly disorders. Although for him there is no such thing as disorder as he is adept at sleeping even on thorns, walking on snow and living near fire. He is well used to living on mere alms so what we can worry about such person! But karma proclaims that serving guru is The foundation. That's why we use eligible funds, by requesting all capable sadhaks, in service of guru and dharma as per our intellect. What we do with the donated fund is a personal matter of the Peeth. We don't divulge any information on our spending; which seems completely suspicious. So please donate (or not donate) funds only after carefully deliberation.
3) The primary goal of Kaulantak Peeth is to further develop Sanatana (Eternal way); to nurture and preserve the traditions. We spread the message of Hindu dharma. We firmly believe that Mahayogi ji is a divine avatar. For his divinity we don't support viewpoints of magical acts nor we claim that he is magical. We are disciples and for us guru is embodiment of God, that's why we always praise him. Even though Mahayogi ji says that he still has some shortcomings and is like any ordinary person but Peeth believes that he is a super man, his birth is with a divine purpose and cause, and he has taken birth as per predictions of Siddhas. He took birth to withstand suffering, criticism, insults and to show the right path to human being. He has been sent by his divine masters amongst people to alleviate suffering of the world. He wear veils of Maya and is a supreme siddha. We cannot see his shortcomings and do not even want to know about them because they would be related to gross reality; and we worship his form in his true essence (Tatva). People who oppose him and are conspiring against him keep sending us cooked up stories or lies everyday. We are grateful to them that they spend such amount of their life's crucial moments thinking against Mahayogi ji! But all this will neither affect us nor change our perspective because only we know him intimately and have closely seen his lifestyle. For us he is such a personality whom we want to only love from all direction. That's why we use all sorts of embellishments in singing his glory! You should use your mind and intellect to follow all these things. Our beliefs may be unscientific- and it is at many places, but still we are firm on our views. So take whatever you feel is right from all this; Mahayogi ji is like an infinite ocean. You can't find anybody like him easily. You can believe him to be a guru or Istha dev but keep discriminating mind focused on essence of things. It would really be amazing that even after knowing all this, you still want to associate with Kaulantak Peeth and want to walk the path shown by Mahayogi ji! In that case, 'we' and 'Kaulantak Peeth' welcome you from the heart!
4) It is mandatory to wear red colored clothes (kurta etc). Red sandalwood maala on neck and for mantra jaap, a small bead rudraksha mala etc. To note down important guidance please keep notebook, pen etc with you. During shivir, personal photography and video recording is completely prohibited. Devices like mobile cellphones etc must be in mute state. 
5) ‘Moksha Sadhana Diksha' will be given only after the donation of INR 10,000/-. But for existing sadhaks this fee will be INR 8000/- only. You can deposit the amount early and obtain the registration serial number. We again request you that only those sadhaka and sadhikas should participate who have firm grasp and faith in world of spirituality. This is not a satsang organized for general public. You can use online account for diksha donation and can obtain information on authorized bank account detail from Swami Krishnanand ji or yogini sister manjusha jee –
HDFC Bank 
Manjusha Savesh
AC.No.-14081000012606
IFSC code-0001408
Please get the registration serial number from Swami Krishnanand ji or yogini sister manjusha jee.
Contact No-
yogini sister manjusha jee -08010209476
Swami Krishnanand ji -09041113113
[Kaulantak Peeth is providing opportunity to be in divine and blissful company of Lord of KaulantakPeeth Mahayogi ji (Kaulantak Peethadishwar) ...come experience the closeness of yogis of mystical Peeth and glorify your life – ‘Moksha Sadhana Shivir’ 8th and 9th June 2013]
                                             -Kaulantak Peeth Team Himalaya