mantra aur mahayogi

मंत्र और महायोगी

posted Jun 13, 2011, 2:43 PM by Site Designer   [ updated Jun 14, 2011, 5:51 PM ]

                                                      मंत्र पुरुष महायोगी 
भारतीय ऋषि परम्परा या कहें धर्म परंपरा बिना मन्त्रों के अधूरी ही है, हिन्दू धर्म का अस्तित्व मन्त्रों के अस्तित्व बिना खाली-खाली प्रतीत होता है, शब्द को ब्रह्म की संज्ञा दी गयी है और योग नें कुण्डलिनी नाद को या नाद ब्रह्म को प्रदर्शित करने व उससे जुड़ने के लिए ध्वनि अर्थात मंत्र बीज की महिमा स्थापित की है, कौलान्तक पीठाधीश्वर मंत्र पुरुष है उन्हें हजारों मंत्र कंठस्थ हैं, कौलान्तक नायक होने के कारण मंत्र बिना उनका कार्य ही संपन्न नहीं हो पाता, शायद इसी कारण मंत्र विद्या सिखाने के लिए पांच-पांच गुरुओं की शरण में रह कर महायोगी जी को अभ्यास करना पड़ा, महायोगी शाबर मंत्र, वैदिक मंत्र, तांत्रोक्त मंत्र, बीज मंत्र आदि में तो निपुण है ही विद्या मन्त्रों के विशेष जानकार हैं, हादी-कादी, मधु-मातंगी, पर-अपर, लौकिक-अलौकिक मन्त्रों के विशेषज्ञ हैं, कई मन्त्रों के पुरुश्चरण सिद्ध कर चुके महायोगी मन्त्रों में गहरी पैठ रखते हैं, मन्त्रों का संसार बड़ा ही रहस्यमय होता है, महायोगी जी को पर्वतों पर रहने वाली योगिनी शक्तियों को प्रसन्न करने हेतु मैंने मंत्र जाप करते हुए कई बार देखा, महायोगी जी मन्त्रों के रहस्य से भी भली प्रकार परिचत है, शुरूआती दिनों में जब मुझे मंत्र का अधिक ज्ञान नहीं था, तब महायोगी जी अपने निकट बिठा कर मुझे मंत्र हेतु न्यास, संकल्प और मंत्र के षोडश संस्कार करवाते जिसमें उत्कीलन, ताडन, शोधन आदि सब शामिल होते हैं, तब भी मंत्र फलता नहीं था तो सुबह के समय मुझे उठा कर कहते कि मैं मंत्र का उच्चारण कर रहा हूँ तुम उसे दोहराना शुरू करो, लगभग एक घंटे तक यही प्रक्रिया चलती रहती, महायोगी जी के पावन सान्निध्य में कई मंत्रार्थियों को मैंने बातचीत व तर्क करते हुए पाया किन्तु महायोगी जी के प्रत्यक्ष व अनुभवात्मक ज्ञान को देख कर किसी की नहीं चलती, महायोगी जी प्रभात में घोष कर अर्थात उच्च स्वर में मंत्र का जाप करते थे, तो कभी बिलकुल मौन हो कर कभी बुदबुदाते हुए भी, ये सब हमारे लिए बड़ा ही रोचक था, उनको इस तरह साधना मंत्र जाप में लीन देख कर हमारा भी मन करता था कि अब हम भी और ज्यादा मंत्र जाप करें, मन्त्रों के रहस्य के बारे में यहाँ सार्वजनिक रूप से बताना ठीक नहीं, किन्तु अलग-अलग साधक को अलग-अलग तरह के मंत्र फलते हैं, ये जरूरी नहीं कि यदि कोई मंत्र मुझ पर कारगर है तो वो दूसरों पर भी कारगर ही होगा, ये तो गुरु ही जानते है कि किस बृत्ति का मंत्र किस तरह के साधक के लिए हितकारी होगा, जो लोग शुरू शुरू में मंत्र की शक्ति को समझ नहीं पाते उनके लिए भी कई तरह के प्रयोग करते हुए मैंने महायोगी जी को देखा है, कुछ विद्या मंत्र तो इतने लम्बे होते हैं कि एक बार पढ़ने में ही अच्छे से अच्छे साधक को भी बीस पच्चीस मिनट लग जाएँ, तंत्रोक्त मंत्र का उच्चारण ही अपने आप में एक समस्या है, अधिकतर मन्त्रों का गायन नहीं होता, केवल कुछ मंत्र ही हैं, जिनका गायन होता है, शाबर मंत्र तो तब तक फलते ही नहीं जबतक कि गुरु भक्ति पराकाष्ठा पर न पहुँच जाए, नाथ व परम्परा नें शाबर मन्त्रों को बहुत आगे बढाया हैं, सिद्ध परम्परा नें तांत्रोक्त मन्त्रों को व बीज मन्त्रों को आगे बढाया है, कर्मकांड व पूजा पद्धति नें वैदिक व शास्त्रीय मन्त्रों को आगे बढाया है, इस तरह मंत्र के अनेक मार्ग हैं, महायोगी सत्येन्द्र नाथ जी महाराज कहते हैं कि, "जब तुम ध्यान की गहराई में उतर जाते हो तो तुम्हें अपने ही भीतर नाद सुने देने लगता है, उसी नाद में बीज मंत्र सुने देते हैं व अनेक शास्त्रीय व वैदिक मंत्र बिना सीखे भी उसे सुन कर ही सीखे जा सकते हैं, कुण्डलिनी शक्ति के बीज ही मंत्र के उत्तपत्ति स्थल हैं, किन्तु शास्त्रानुसार भगवान् शिव ही मंत्र नायक है," यदि आप मंत्र साधक है तो ये आपका सौभाग्य ही होगा कि आप महायोगी जी से मिल कर मंत्र ग्रहण कर सकें, महायोगी जी के सान्निध्य में कुछ समय अवश्य व्यतीत करना चाहिए, महायोगी जी को आप हिमालयों पर, बनों में, पानी के भीतर, बृक्ष पर, कंदराओं में, मंदिर में, नदी तट पर व एकांत में मंत्र साधना करते देख सकते हैं, समाधी अभ्यास को छोड़ कर वो लगभग सभी स्थितियों में मंत्र का उपयोग करते ही हैं, कुछ चित्र देख 
लीजिये इन सभी क्रियाओं में मंत्र कही न कहीं जरूर विद्यमान हैं, मंत्र का मन अर्थात भाव से बड़ा ही गहरा सम्बन्ध है, जितना समर्पण आप मन्त्रों को देते है उतना ही फल आप प्राप्त कर पाते हैं, किन्तु मंत्र को मुक्ति का सबसे छोटा और सरल उपाय बताया गया है क्योंकि आम से आम व्यक्ति भी मंत्र का जाप कर सकता है, इस पृथ्वी पर ही नहीं 
अपितु सम्पूरण सृष्टि में कोई ऐसा नहीं है जो नष्ट न हो, हैं भी संसार को अलविदा कहना ही है, तो ऐसे में मृत्यु पश्चात के अज्ञात का सामना करने के लिए मंत्र को ब्रहमास्त्र माना गया है, गृहस्थ जीवन में भी भजन और मंत्र सबसे सुगम उपाय है, मंत्र से बल मिलता है, मंत्र से शान्ति मिलती है, मंत्र से भक्ति प्रबल होती है,  मंत्र से ही वरदान मिलता है,
मंत्र से ही इष्ट के दर्शन भी होते हैं, मंत्र गुरु की शक्ति होता है, एक ही मंत्र यदि साध लिया जाए तो वो जीवन की दिशा और दशा बदल सकता है, किन्तु मंत्र को सिद्ध करने का उपाय है कि बार-बार मंत्र का जप करो उसके मर्म से जुड़े रहो, उसकी शक्ति को अनुभव करो, मंत्र की सफलता का उपाय बताते हुए महायोगी जी कहते हैं कि कुछ मन्त्र एकाग्रता से
सिद्ध होते हैं, कुछ विचार विसर्जन से, कुछ संस्कार शोधन से, कुछ पापों के प्रायश्चित से, कुछ केवल गुरु की कृपा से से सिद्ध होते हैं, जीवन चाहे अमीरी में कटे या गरीबी में दोनों का संतुलन होना जरूरी होता है, जिसे बनाने में मंत्र अहम् भूमिका रखता है, जीवन में संकट आने पर या दुःख आने पर परेशान नहीं होना चाहिए, अपितु 
इष्ट देवी-देवता की उपासना करनी चाहिए और मंत्र का सहारा लेना चाहिए केवल इतना ही पर्याप्त होता है और सब वेदनाएं नष्ट होती हैं, अपने कुल देवता और इष्ट के मन्त्रों का सदा जाप करने वाला कभी संकट की स्थिति से नहीं गुजरता, शान्ति एवं सुख पूर्वक जीवन जीते हुए परम तत्व को प्राप्त करता है, जो जीवन का परम उद्देश्य भी है................  

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