Introduction to Mahayogiji(English) संक्षिप्त परिचय(Hindi)

posted Jun 11, 2011, 4:39 PM by Site Designer   [ updated Nov 12, 2012, 6:30 AM ]

 श्री गुरु स्तवन

गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः |

गुरुर्साक्षात परब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः ||

ध्यानमूलं गुरुर्मूर्ति पूजामूलं गुरोः पदम् |

मंत्रमूलं गुरोर्वाक्यं मोक्षमूलं गुरोः कृपा ||

अखंडमंडलाकारं व्याप्तं येन चराचरम् |

तत्पदं दर्शितं येन तस्मै श्री गुरवे नमः ||

ब्रह्मानंदं परम सुखदं केवलं ज्ञानमूर्तिं |

द्वन्द्वातीतं गगनसदृशं तत्त्वमस्यादिलक्षयम् ||

                                                                                                     एकं नित्यं विमलं अचलं सर्वधीसाक्षीभूतम् |

Click here for English version                                        भावातीतं त्रिगुणरहितं सदगुरुं तं नमामि  ||                    .                         

                                                                                                  त्वमेव माता च पिता त्वमेव, त्वमेव बंधुश्च सखा त्वमेव |

                                                                                                      त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव, त्वमेव सर्वं मम देव देव ||


दिव्य दर्शन- श्री पञ्च पीठाधिपति कलि कुल नायक कौलान्तक पीठाधीश्वर महायोगी सत्येन्द्र नाथ जी महाराज (हिमालय पुत्र) 


II "श्री कौलान्तक पीठाधीश्वर श्रद्धेय महायोगी सत्येन्द्र नाथ जी महाराज की लघु गाथा" II
कौलान्तक पीठाधीश्वर महायोगी सत्येन्द्र नाथ जी के बारे में बताना बहुत ही असंभव कार्य है, ये ठीक ऐसा ही है कि कोई कहे सागर को गागर में भर लाओ, ऐसा कार्य तो केवल कोई बाजीगर या जादूगर ही कर सकता हैं, लेकिन यदि मैं कुछ न कहू तो और भी मूर्खता होगी, अपनी बुद्धि से जो समझ सका वो ही कहने का प्रयास करता हूँ, गलतियों पर आप ध्यान न दे कर मुझे क्षमा करते रहें, ये गाथा शुरू होती है सन1983 से जब श्री कृष्ण जन्माष्टमी का त्यौहार मनाया जा रहा था, संभवतया 23 अगस्त की रात थी, रात के समाप्त होते होते ब्रह्म मुहूर्त में जन्मे करोड़ों साधकों के नयनो के प्रखर सूर्य, "महायोगी सत्येन्द्र नाथ जी महाराज", मानो कोई अद्भुत सा परिवर्तन मौन प्रकृति में कहीं हुआ हो, जिसकी भनक कुछ हिमालय के दिव्य साधकों को लग गयी, जैसे मानो उनको दैव प्रेरणा से कोई महासन्देश प्राप्त हुआ हो, प्रकृति भी शान्त थी, सुबह के अंधकारमय बादलों से प्रकाश की पहली किरणे नीचे झाँकने लगी, जो हिमालय पुत्र के आने की सूचना लिए थी.......
   महायोगी जी का धरा पर जन्म मानो नयी प्रभात का सुख 
वो दिन भी आम दिनों की तरह ही गुजर गया, लारजी नाम की वो जगह हिमाचल प्रदेश के कुल्लू जिला में है, बस कुछ घरों का छोटा सा गाँव...जहाँ पैदा हुए महायोगी, महायोगी के पैदा होने की सूचना कहा जाता है कि तत्क्षण हिमालय में बैठे "महागुरु कौलान्तक पीठ शिरोमणि प्रातः स्मरणीय श्री सिद्ध सिद्धांत नाथ जी महाराज" को मिल गयी, भारत में स्थित हिमालय के योगियों के प्रताप को कौन नहीं जानता? पीठ शिरोमणि नाथ गुरु, सूर्य योगी होने के कारण बिना भोजन पानी के 22 वर्ष की आयु से हिमालय में स्थित "खण्डाधार" नामक पर्वत श्रृंखला में कही गुफा में समाधिस्थ थे, वे कई वर्षों से मानव जाती से दूर रहे, बिलकुल अकेले समाधिस्थ, यही परम सिद्ध योगी ही महायोगी जी के गुरु बने, लेकिन उनहोंने महायोगी जी के जन्म लेते ही समाधी तोड़ दी और महायोगी के कुछ बड़ा होने तक प्रतीक्षा करने लगे, इधर शिशु महायोगी का नामकरण हुआ सत्येन्द्र......कुम्भ राशी....शतभिषा नक्षत्र....लेकिन गावं में महायोगी जी की दादी को नाम बहुत जटिल लगा, सत्येन्द्र कहने में बहुत बल लगता था, तो उन्होंने कहा की घर पर ये नाम बिलकुल नहीं चल सकता, मैं इसे सतीश या सत्या कह के बुलाऊंगी....आसान लगता है........फिर

      मानो किरणें हिमालय को छू कर कोई सन्देश दे रही हों               सहमती हुई की असली नाम तो सत्येन्द्र ही होगा.....क्योंकि कुल पुरोहित ने रखा है टाला नहीं जा सकता, पर घर में ये नया नाम भी चलेगा, फिर गांव के बाताबरण में ही महायोगी पलने बढ़ने लगे............................
   महायोगी जी के गाँव में चरने जाता भेड़ बकरियों का समूह 
महायोगी जी के पैतृक गाँव का नाम है "धाराखरी"जो कुल्लू में है, ये गाँव सड़क से तब बहुत ही दूर था, घंटो की सीधी चढ़ाई चढ़ कर ही गाँव के लोग अपने घरों तक पहुंचते थे, खेती ही प्रमुख पेशा था, लेकिन महायोगी जी के पूज्य पिता भारतीय डाक बिभाग में पोस्टमास्टर के पद पर तैनात है, लेकिन पारंपरिक खेती अभी भी प्रचलित हैं, पहाड़ों की अति क्लिष्ट जीवन शैली बड़ों-बड़ों का साहस पस्त कर देती है, लेकिन महायोगी जी की माता खेती बाड़ी के कामों में अति कुशल थी इसी कारण खेत खलियानों में खेलते हुए, महायोगी धीरे-धीरे बड़े होने लगे, यहीं से महायोगी जी के अन्दर "वैदिक कृषि" का अंकुरण हुआ, महायोगी जी के जन्म से पूर्व ही उनके दादा स्वर्गवासी हो चुके थे, इसलिए संयुक्त परिवार जिसमे महायोगी के चाचा भी थे, साथ ही रहते थे और घर की मुखिया थी महायोगी जी की दादी माँ, जिनकी आज्ञा मानों "राज आज्ञा" ही हुआ करती थी, लेकिन उनको महायोगी जी से विशेष स्नेह था, इस तरह एक बड़े परिवार जिसमें कई सदस्य और भी थे के बीच महायोगी जी पले, बस उस गाँव की दो बहुत बड़ी समस्याएँ थी, पहली सड़क, सड़क तब न होने के कारण कई बीमार और घायलों को बचाया नहीं जा सका, लेकिन अब एक कच्चा सड़क मार्ग सन 2009 में ही बन कर तैयार हुया है, साथ ही पानी की समस्या, पानी की दो ही प्राचीन "बाबाड़ियाँ" थी, क्यूंकि पहाड़ों पर कुंए नहीं होते, उनमे से भी एक तो गर्मियों में सूख ही जाती, केवल एक में ही पानी रहता था..................
महायोगी जी का गाँव धाराखरी जहाँ केवल 15 -20 घर ही हैं

गाँव के पीछे सूखा गहरा नाला और खाई है, लेकिन फिर भी पूर्वजों नें इस स्थान को इसलिए चुना क्योंकि इस जगह पर "तोतला पीठ" है, "माँ तारा" का एक रूप हैं "माँ तोतला", साथ ही गाँव के पीछे "जोगिनीगंधा" नाम का दिव्य पर्वत हैं, जिसकी देवी "माता भ्रामरी"है, जो मधुमख्खियों के रूप में दर्शन देती हैं और महायोगी जी का यह घर हिमालयन पद्धति से बना पारंपरिक घर है, जो बहुत बड़ा, चार मंजिलो का घर हैं, जिस घर की स्वामिनी "हंसकुंड" की योगिनी शक्तियां हैं और इस गाँव के मालिक देवता "खहरी"नाम के यक्ष हैं, इसी कारण गांव का नाम "धाराखरी"पड़ा, यहीं वो पानी की "बाबडी" भी है, जो इसी यक्ष की प्रसिद्द बाबड़ी है, जिसका नाम है "खरीबाई", ये सब ऐसा लगता है मानो की हम कोई रामायण महाभारत की कोई कहानी पढ़ रहे हों, लेकिन ये सब सच है और आज भी ये सब जगहें ऐसी की ऐसी ही हैं, यकीन नहीं होता ! ये रही यक्ष महाराज की बाबड़ी



 "खरीबाई" जिसका पानी गाँव में पाप बढ़ने पर सूख जाएगा 


यही वो पानी की बाबड़ी है जहाँ से महायोगी जी पानी बर्तनों में उठा कर अपने घर ले जाया करते थे....इस बाबड़ी के देवता यक्ष ने कहा है की जब इस गाँव में पाप अधिक हो जाएगा तो वो पानी रोक देंगे....साथ ही इस गाँव में "वनशिरा" नाम के देवता भी रहते हैं.....जो बनो की रक्षा करने वाले देवता माने जाते हैं.....उनका मंदिर भी इसी गाँव में है....तो महायोगी जी ने ऐसा बातावरण बाल्यकाल से देखना समझना शुरू कर दिया था की वे पूर्ण ज्ञान पा सकें.....पारिवारिक पृष्टभूमि यदि देखें तो महायोगी जी के दादा कुलदेवता "श्री शेषनाग जी" की सेवा में ही आजीवन समर्पित रहे.....महायोगी जी का पैतृक घर उनके परदादाओं ने बनाया है.....इतना पुराना होने के बाद भी ये घर अभी तक जीवंत ही है....आइये में आपको इस पहाड़ी शैली के चार मंजिला मकान के दर्शन करवा दूँ..........



यही है महायोगी जी का धाराखरी गाँव में पुराना पैतृक घर 
बातों-बातों में ये बताना तो मैं भूल ही गया कि जब महायोगी सत्येन्द्र नाथ जी महाराज तीन बर्ष कुछ माह के हुए ही थे कि एक दिन उनके पिता जी के पास एक लम्बे कद का लम्बी दाढ़ी मूछों वाला साधू आया और कहने लगा कि तुम्हारे घर पर एक बालक पैदा हुआ है, जिसके बांये पांव के अंगूठे के नीचे रेखाओं का गोल चक्र है, वो मेरा पिछले जन्म का शिष्य है, मुझे उसे देखना है, तब तक महायोगी जी के माता पिता ने भी बालक के पाँव के नीचे के चक्र को नहीं देखा था, जब देखा तो बहुत ही हैरान हुए और वो साधू कहने लगा कि यह बालक उनको सौंप दिया जाये, भला कोई माता पिता किसी के केवल इतना कहने से अपना बालक सौंप देंगे क्या? उनहोंने साधू को समझाया, लेकिन साधू नहीं माना, जिस कारण दोनों पक्षों में तनातनी हो गयी, अंततः इस बात पर निर्णय हुआ कि बालक साधू को नहीं दिया जायेगा, लेकिन बालक को दीक्षा दे कर साधू का शिष्य बनाया जायेगा, ये साधू कोई और नहीं स्वयं "महागुरु कौलान्तक पीठ शिरोमणि प्रातः स्मरणीय सिद्ध सिद्धांत नाथ जी महाराज" थे, इस तरह तीन वर्ष कि आयु में ही महायोगी जी हिमालय कि सिद्ध परम्परा में दीक्षित हो गए, महागुरु का कोई चित्र नहीं है, केवल एक मात्र रेखाचित्र ही है जिसकी महायोगी सत्येन्द्र नाथ जी महाराज पूजा करते हैं, यहाँ मैं वो चित्र दे रहा हूँ ताकि दादागुरु जी कि छवि का कुछ अनुमान आपको भी हो सके....................
पीठ शिरोमणि प्रातः स्मरणीय श्री सिद्ध सिद्धांत नाथ जी महाराज
महायोगी बिधिवत दीक्षित हो गए और उनकी गुप्त साधनाएँ तभी से थोड़ी-थोड़ी शुरू हो गयी, यहीं महायोगी जी को मिला महागुरु से टंकारी लिपि, भूत लिपि, देव लिपि आदि का ज्ञान क्योंकि महागुरु हिंदी आदि लिपियाँ नहीं जानते थे इसलिए महायोगी जी को ये लिपियाँ सीखनी पड़ी, योग,ज्योतिष, तंत्र, मंत्र, वास्तु, कर्मकांड, यन्त्र, आयुर्वेद, वेद-पुराण, उपनिषद सहित तंत्र ग्रंथों का महायोगी जी ने क्रमशः अध्ययन किया और सात वर्ष कि छोटी सी अवस्था में महायोगी जी अपने गुरुदेव जी के साथ पहली बार हिमालयों कि श्रृंखलाओं में साधना हेतु गए बस तभी से हिमालय के विराट योगी बनने का सफर शुरू हो गया, महायोगी जी अपने बाल्यकाल में उत्तरांचल जो तब इस नाम से अस्तित्व में नहीं था, सहित जम्मू कश्मीर के क्षेत्रों में स्थित हिमालयों पर अपने गुरु के साथ साधना करने जाते रहे, हिमाचल, लेह लद्दाख, सहित सारे क्षेत्रो कि हिम श्रृंखलाएं बालक महायोगी जी के पावन सान्निध्य कि गवाह बनीं, महायोगी की कठोर साधनाएँ संपन्न होने लगी, उनको घनघोर तप करता देख महागुरु ने उन्हें, अन्य गुरुओं के पास जाने को कहा, फिर महायोगी जी क्रमशः 38 परम दिव्य गुरुओं कि शरण में ज्ञान लेने गए और साधना पथ पर निखरते चले गए, यहाँ ये बताना आवश्यक है कि महागुरु के तीन और शिष्य भी थे जिन सबमें महायोगी जी सबसे छोटे थे, सबसे बड़े गुरु भाई का नाम "किरीट नाथ", फिर "प्रगल्भ नाथ", फिर शंभर नाथ और सबसे छोटे "सत्येन्द्र नाथ", सबसे तीब्र बुद्धि और पूर्व जन्म के तेज के कारण महायोगी जी साधनाओं में निष्णांत होते चले गए, आइये बाल महायोगी जी के दर्शन करें..................
   बालक रूप में कौलान्तक पीठाधीश्वर महायोगी जी महाराज 
महायोगी जी का ज्ञान इतना विस्तृत है की कोई भी कल्पना नहीं कर सकता, मुझे याद है कि जब मैंने महायोगी जी को पहली बार देखा था, तो सोचा कि ये कैसा युवक है जो इतना बड़ा दावा करता है कि वो हिमालय का योगी है, मन ही मन हँसी आ रही थी, कमजोर शरीर देख कर ऐसा लग रहा था कि कहीं खरोच न लग जाए, क्योंकि महायोगी जी का रंग गोरा होने के कारण वे बिलकुल नाजुक से प्रतीत होते हैं, यही कारण है कि कोई उनको देख कर ये मानने को तैयार नहीं होता कि वो इतने बड़े योगी हो सकते हैं, मैंने तो सोचा था कि जीवन में असली योगी मिल ही नहीं सकता, लेकिन आज जान गया हूँ कि हमारे मन में जो कल्पना है, हम उसे ही ढूढ़ते रहते हैं और वो कल्पना ही होती है उसका वास्तविकता से कोई लेना देना नहीं होता, जब मुझे महायोगी जी के साथ हिमालय पर रहने का सौभाग्य मिला तो जान पाया कि महापुरुष कैसे होते हैं, आराम परस्त जीवन जीते-जीते मुझे भी आलोचना करते रहने कि आदत पड़ गई थी, अब पता चला कि कि छोटा सा टिला भी नहीं चढ़ सकते, तो कहाँ महायोगी खून जमा देने वाले हालातों में भी खुश और ऊँचे पर्वतों के शिखरों पे ऐसे सजते हैं कि मानो वो पर्वत बने ही महायोगी जी के लिए हो, ये मेरा सौभाग्य है कि मैं उनका सेवक हूँ, ईश्वर जन्म-जन्म मुझे महायोगी जी के साथ रखे, वास्तविक धर्म को खोजने वालों को जब सब ओर अँधेरा ही अँधेरा दिखने लगा तब इस घनघोर अन्धकार में दैव प्रेरणा से नया प्रकाश हुआ है........
कलियुग के अन्धकार में महायोगी रुपी दिव्य ज्ञान सूर्य का प्राकट्य 
गुरुओं से ज्ञान ले कर व कठोर तप की प्रक्रिया से गुजर कर ही महायोगी जी दिव्य प्रखर सूर्य बन पाए हैं, लेकिन महायोगी जी कि सिद्धियों,तप और साधना की बातों को लोगो से बहुत छुपा कर रखने का प्रयास किया गया, क्योंकि कुल्लू में इस तरह की परम्पराएँ प्रत्यक्ष नहीं हैं, वहां केवल "देउली"नामक धार्मिक लोक परम्परा को ही लोग मानते है, आधुनिक गुरुवाद भी कुछ कथित शहरियों द्वारा ही वहां फैलाया गया, जो विशेषतया अपने किसी गुरु या संगठन के प्रचार के लिए वहां आये थे, जिन्हें वास्तविकता का भान ही नहीं लेकिन समझते है की वो अध्यात्म में सर्वोपरि हो गए, लेकिन शायद ये सब कहने का अधिकार मुझे महायोगी जी नहीं देंगे, वो कहते हैं की सबको ईश्वर नें उनके स्तर के अनुरूप ही गुरु भी दिए होते हैं, अगर गुरु का स्तर ज्यादा ऊँचा हो जाए तो शिष्यों को गुरु ही ढोंगी लगने लगता है, इसलिए केवल उच्चकोटि का साधक बिना कुछ बोले ही समझ जाता है, कुल्लू की घाटियों में दिव्य साधक केवल गुप्त रूप से ही साधक ऐसी साधनाओं को करते है, लोग योगी हो जाने को अच्छा नहीं मानते, लेकिन धीरे धीरे लोगो को ये बात पता चल गई, महायोगी जी कभी जंगलों में कभी ऊँचे पर्वतों पर होते हैं, जहाँ कुछ गड़रियों ने उनको देख लिया था और उनहोंने ही ये रहस्य जनता के सम्मुख खोला, धीरे धीरे नृत्य,गायन,श्रृंगार सहित.......हठ योग.......वेद वेदांग में पारंगत हो महायोगी जी 64कलाओं में संपन्न हो गए और इस दौरान महायोगी जी की अनेक सिद्ध योगियों से मुलाक़ात हुई, जिनसे सत्संग का लाभ भी महायोगी जी को प्राप्त हुआ, लेकिन हिमालयों में रह पाना आसान नहीं था और प्रकृति के इतने विरुद्ध जा कर रहने के कारण महायोगी जी का स्वभाव बहुत ही उग्र हो गया, लम्बे समय तक अकेले रहने के कारण वे ज्यादातर गंभीर दिखने लगे बर्फ का सामना कर पाना सरल नहीं होता यदि आपको लम्बे समय तक वहां अकेला रहना पड़े, ऐसे में महायोगी जी को महागुरु ने दी "महाचंद्रायण"पूर्ण करने की आज्ञा, ये तो जले पर नमक जैसा हो गया, क्योंकि "महाचंद्रायण"का अर्थ होता है, दस माह सोलह दिन तक अपने अतिरिक्त किसी दूसरे मानव को न देखना और निर्जन हिमालय पर बिना बस्त्रों के दिगम्बर अवस्था में रहना और आपको जान कर हैरानी होगी की तब महायोगी जी की आयु केवल 14वर्ष थी और कुछ ही समय पहले महायोगी जी भयंकर जहर के प्रभाव को झेल चुके थे.................
महायोगी जी केवल ऐसे जनशून्य स्थान को ही साधना हेतु चुनते हैं  
दरअसल महायोगी जी के गुरुभाइयों से महायोगी जी बहुत आगे हो चुके थे और वो आयु में महायोगी जी से काफी बड़े भी थे, इसलिए उनके मन में कलियुग का क्षणिक प्रवेश हो गया, ईर्ष्यावश उनहोंने एक शाम महायोगी जी की सब्जी में पहाड़ी "काला महुरा"नाम का एक भयंकर जंगली औषधि का पौधा डाल दिया, जो वास्तव में कालकूट नाम का विष होता है, अबोध महायोगी अपने सभी बड़े गुरु भाइयों को बहुत प्यार करते थे और वे इस तरह के कृत्य की कल्पना भी नहीं कर सकते थे, उनहोंने सब्जी के साथ साथ विष का सेवन कर लिया और भोजन करने के कुछ ही समय बाद महायोगी जी के पेट में बहुत तेज दर्द होने लगा, वो असहनीय पीड़ा इससे पहले कि ठीक हो पाती या उस पर महायोगी जी नियंत्रण करते, खून की उल्टियाँ होने लगी, दुर्भाग्यवश उसी दिन महागुरु भी साधना के लिए दूसरे पर्वत पर गए हुए थे, महायोगी कि ऐसी हालत देख कर गुरुभाइयों को बड़ा पश्चाताप हुआ, उनहोंने महायोगी को बता दिया कि उनहोंने केवल तंग करने के उद्देश्य से ये काम किया था, क्योंकि महायोगी आयुर्वेद के ज्ञाता थे वो जान गए कि अब तो जिन्दा बच पाना मुशिकल ही है, वो अपने माता पिता को याद करने लगे, तभी उनके एक गुरु भाई "शंभर नाथ" ने उनको पीठ पर उठाया और रात भर चल कर महायोगी जी को सैंज नामक स्थान तक पहुँचाया, जहाँ से महायोगी जी अपने घर पहुंचे और फिर कुल्लू अस्पताल में दाखिल करवा दिए गए, बचने कि उम्मीद कम होने के कारण उनको चंडीगढ़ भेज दिया गया, रास्ते में महायोगी "कोमा"में चले गए उनके साथ उनके माता पिता थे, ये तो भला हो कि महायोगी जी ने सब्जी का स्वाद अच्छा न होने के कारण उसे पूरा नहीं खाया, अन्यथा दो घंटों में ही ब्रह्मलीन हो जाते, क्योंकि उत्तरी भारत में दिल्ली से पहले चंडीगढ़ ही बड़ा अस्पताल वाला स्थान है, वहीँ महायोगी जी को होश आया, तो उनहोंने अपने आप को जीवित पाया................
     महायोगी जी ने अपने जीवन के डूबते सूर्य को देख लिया 
हालाँकि ये बात माता-पिता से छुपा कर रखी गयी, लेकिन पूज्या बहन मञ्जूषा जी ने अब महायोगी जी कि उपचार के दौरान बनी पूरी फाइल अपने पास सुरक्षित रख ली है, महायोगी जी कि जान तो बच गई लेकिन नयी समस्या पैदा हो गयी, उनको तभी से ले कर आज तक शरीर के किसी भी भाग में कोई न कोई समस्या रहती ही है, लेकिन प्रमुख समस्या तो ये थी कि जहाँ उनको कोई चोट लगती वहां से खून बहता ही रहता वो बंद ही नहीं होता था, इस समस्या का निदान स्वयं महायोगी जी के दिव्य आयुर्वेद गुरु "पूज्य श्री वेद मुनि जी महाराज" नें आयुर्वेदिक औषधियों से किया, गिरते स्वास्थ्य को महायोगी जी ने योग साधना से नियंत्रि कर रखा है, इसी बीच दो बहुत ही बुरी घटनाएं हुईं, जिन्होंने महायोगी जी पर बहुत नकारात्मक प्रभाव डाला, महायोगी जी के पैतृक घर में एक गाय थी जिसे महायोगी जी अक्सर घास डालते, पानी डालते और अपने हाथों से सहलाते थे और गौ माता भी बालक का प्रेम देख कर चुपचाप खड़ी रहती, महायोगी कभी सींगो से खेलते कभी पूंछ से, लेकिन एक दिन सुबह दादी जी ने बताया कि मैंने गांव से कुछ लोग बुलवाए हैं, गाय मर गयी तो वो दूर नाले में दवा देंगे, उनहोंने वैसा ही किया, चुप चुप कर महायोगी जी भी उनको देखने गए, उनहोंने गाय को दवाया नहीं बस नाले में फेक दिया, घर पर महायोगी बता न सके, अन्यथा पूछा जाता कि तुम वहां क्या करने गए थे, दूसरे दिन दोपहर को महायोगी फिर उसी स्थान पर पहुंचे, तो देखा मरी गौ को गिद्ध नोच रहे हैं, इस बात से उनको बहुत परेशानी हुई, अब वो रोज वहां जाने लगे, मुह पर कपडा रख कर सड़ांध से बचने का प्रयास करते, अंत में केवल गौ का अस्थि पिंजर ही रह गया, बहुत ही भयानक अनुभव था, जिस गौ माता का दूध पिया वो ऐसी हो गयी, जब बुरा होना हो तो साथ ही होता है, अपने घर पर ही महायोगी चिड़ियों को दाना डालते थे, एक दिन उसी स्थान पर एक मरी चिड़िया दिखी, अब महायोगी विचलित हो गए, उन्होंने महागुरु के पास जाने का मन बनाया....................
महायोगी जी को चिड़िया कि मृत्यु ने बहुत ही परेशान कर दिया 
महायोगी जी को लगभग चार दिनों कि कठिन पैदल हिमालय यात्रा कर महागुरु को खोजने निकले क्योंकि महागुरु किसी भी एक स्थान पर नहीं रहते....इसलिए हिमालयों में उनको ढूढ़ पाना अत्यंत जटिल कार्य हैं, पर्वतो पर भटक भटक कर आखिरकार जब महायोगी जी महागुरु से मिले तो उनहोंने मृत्यु के विषय में प्रश्न किया और जिद करने लगे कि ये रहस्य जाने बिना वो आगे कोई साधना तप करेंगे ही नहीं, महागुरु ने बहुत समझाया कहा कि तुम्हें पुराणो का ज्ञान आदि मृत्यु विषयक जानकारियां दी जा चुकी है, अतः अपने विवेक से काम लो, लेकिन न जाने किस प्रेरणा के अधीन हो कर महायोगी जी टस से मस नहीं हुए उनहोंने सारी साधनाएँ रोक ली, महागुरु ने कहा इसका केवल एक विकल्प हैं, वो है पूर्व जन्म देखना, फिर तुम प्रश्न नहीं करोगे, लेकिन ये सब बहुत दुखदायी है, तुम इसी दुनिया में रह कर भी इसका आनद न ले पाओगे, तुम्हारे जीवन में एक समस्या पैदा हो जाएगी, कभी कभी तुम कृत्रिमता और वास्तविकता में अंतर नहीं कर पाओगे, लेकिन महायोगी थे कि कोई कुछ भी कहे बस उनको तो जानना ही था, क्रोधित हो कर महागुरु ने महायोगी पर "ब्रह्मपात" किया, और महायोगी मूर्छित हो गिर पड़े, पांच दिन और रात लगातार मूर्छा कि अवस्था में महायोगी जी ने सब कुछ जान तो लिया पर शायद इस घटना से उनको सुख कि बजाये और दुःख पहुंचा, कोई नहीं जानता कि उन्होंने क्या देखा, पर महायोगी जी के आयुर्वेद गुरु परम पूज्य "वेद मुनि"जी के अनुसार महायोगी जी के पिछले जन्म का शरीर "ममी"के रूप में अभी भी हिमालय में ही है, क्योंकि कौलान्तक संप्रदाय को मानने............
हिमालय पर खड़ी चट्टानों पे चढ़ते महायोगी सत्येन्द्र नाथ जी
योगी समाधी में जाने से पूर्व कुछ ऐसी तैयारियां कर लेते थे कि उनका शरीर दो तीन हजार सालों तक क्षत-विक्षत हालत में ही सही पर पड़ा रहता था, महायोगी जी के कुछ सौभाग्यशाली शिष्यों में से मैं भी एक हूँ जिसने हिमालय में उनका ये शरीर देखा है, लेकिन महायोगी जी से यदि इन विषयों पर चर्चा कि जाए तो बड़ी ही कुशलता से बात टाल देते हैं, जिद्द कर यदि हम पूछें तो इनकार कर देते है कि वो इस बारे में कुछ नहीं जानते, लेकिन पूर्व जन्म को देख कर क्या हुया, ये सब अभी तक राज है, किन्तु जब कभी महायोगी जी क्रोधित हो कर कुछ शिष्यों को लताड़ते हैं, तो उनके मुह से अस्थिरावस्था में निकलता है कि "मेरा तो पूर्व जन्म पर से विश्वास ही उठ गया है", यानि कि कहीं कुछ तो है, पर कोई बताना ही नहीं चाहता, मैं इसी कारण भारत के योगियों से कभी-कभी लड़ने का मन बनाता हूँ कि अगर वास्तव में ऐसा कुछ है तो जनता को क्यों नहीं बताया जाता, इससे मानव जाती का कल्याण ही होगा, विज्ञान के सामने बातें आएँगी तो वो भी सच्च खोजने का प्रयास करेंगे, पर ये तो मेरे निजी विचार है, महायोगी जी कि कल्पना कृपया आप ऐसी न करे कि वो क्रोधित नहीं होते होंगे, बहुत शान्त ही हैं, या रामायण के किसी ऋषि कि तरह उपदेश ही देते रहते होंगे, घास कि कुटिया होगी, धोती पहने,माला पहने कुछ शिष्य आश्रम में घूम रहे होंगे, क्योंकि लोग कहते है कि संत को क्रोध नहीं करना चाहिए और महायोगी जी करते भी नहीं हैं, लेकिन माया फैलाने के लिए ये सब किया जाता है, जिसे मूढ़ नहीं समझ पाते और निंदा करना शुरू कर देते हैं, इसी कारण लोग नकली संतों के बनावटी चहरे देख कर धोखा खा जाते हैं और असली को वे ठुकराते हैं, पर शायद ये जरूरी है ताकि ऐसे दिव्य योगी सांसारिक उलझनों से दूर रह सकें, इसीलिए परमात्मा ने ऐसी व्यवस्था कर रखी है, हिमालय में साधक बर्ग उनको "महाभिमानी अतिक्रोधी ईशपुत्र सत्येन्द्र नाथ महायोगी" कहता हैं....ऐसा क्यों? कृपया ये आप मत पूछियेगा ! वास्तविक योगियों कि यही रीत होती है.........
     आयुर्वेद गुरु श्री वेद मुनि जी कि गुफा के सामने महायोगी 
महायोगी जी के परिवार को महायोगी कि बहुत चिंता रहा करती थी कि बिना बताये लम्बे लम्बे समय तक महायोगी पर्वतों पर न जाने कहाँ-कहाँ चले जाया करते थे, महायोगी जी के बारे में जब लोगों से परिवार सुनता कि वो हिमालय के उस बर्फीले इलाके में नजर आये तो माता पिता का गला सूख जाता था, कोई माँ अपने पुत्र को ऐसी हालत में कभी नहीं देखना चाहेगी, पिता ने सुख सुबिधायें देने में कोई कोर-कसर भी नहीं छोड़ी थी, फिर भी महायोगी जी थे कि परिवार कि ओर ध्यान ही नहीं दे पाते थे, जब महायोगी जी कि शिकायतें बहुत बढ़ गयी कि लडके को वहां इतनी बर्फ में मत भेजो मर जाएगा, गलेशियर में या पहाड़ी धसने से कई लोग मर चुके हैं, जैसे वाक्यों से परिवार का तनाव और बढ़ गया, उनहोंने महायोगी जी को लगातार जाने से मना कर दिया, लेकिन फिर भी महायोगी जी भाग-भाग कर चले जाते, जिस कारण घर में विवाद बढ़ने लगा, घर पर हर रोज झगड़े होने लगे, माता पिता आपस में ही लड़ जाते कि तुम तो समझा सकते हो, मेरी राय में ये था भी उचित ही दुनिया के सबसे अच्छे माता-पिता अपने बच्चों के लिए कुछ भी करने को तैयार रहते हैं, लेकिन वो नहीं जानते थे कि उनहोंने जिस पुत्र को जन्म दिया है, ये कोई आम पुत्र नहीं, करोडो लोगो का प्रिय हिमालय का सबसे बड़ा योगी है, पर शायद ममता और पिता का स्नेह ये सब नहीं देखता, यहाँ ये बताना बहुत ही आवश्य है कि महायोगी जी का एक छोटा भाई है, जो सदा महायोगी जी के साथ ही रहा करता है, महायोगी जी के साथ हिमालय भी गया है, महायोगी जी से दीक्षा ले कर उनका शिष्य बन गया, केवल एक यही परिवार में सहारा होता था.......
   इन शिखरों पर शीत ऋतू में केवल महायोगी ही रह सकते हैं 
कुछ ही दिनों में महायोगी जी को महागुरु का बुलावा आया, महायोगी जी अभी-अभी आसाम से लौटे थे, महागुरु ने ही उनको तंत्र और अघोर विद्या का अध्ययन करने भेजा था, वहां एक साधारण से गांव में एक स्त्री जिनको महायोगी जी "माँ ज्येंद्रा भैरवी" कहते हैं, के पास गए थे, जो महायोगी जी कि गुरु हैं, लेकिन इतनी गुप्त हैं कि वहां के गांव के लोग तो क्या परिवार के लोग भी नहीं जानते कि उनके घर में रह रही स्त्री कोई साधारण स्त्री नहीं, तंत्र और अघोर कि सबसे ऊँची प्रतिमूर्ति है, जो अपनी दिव्य क्षमताओं के कारण महागुरु को जानती है, जबकि कभी हिमाचल आई ही नहीं, मैं अधिक नहीं बता सकूँगा, महायोगी जी के 38 दिव्य गुरु है, सबके बारे में यहाँ जिक्र करूँ ये संभव नहीं है, महायोगी जी ने जाना कि तंत्र मन्त्र के नाम पर बलि शराब स्त्री गमन आदि घटिया बाते तो तंत्र में है ही नहीं, क्योंकि पहले ही तंत्र का नाम आने से महायोगी ने आसाम जाने से इनकार कर दिया था, लेकिन महागुरु ने कहा तुम जा कर देखो, तुम्हारा भ्रम टूट जायेगा और ऐसा ही हुआ, मैं बात कर रहा था कि महागुरु का बुलावा आते ही उनसे मिलने महायोगी जी हिमालय गए, महागुरु ने उनको समाधिस्थ होने कि आज्ञा दी और कहा योग को बहुत ज्यादा सीख गए हो अब जीवन में उतार कर देखो, महागुरु कि आज्ञा पा कर महायोगी जी "लाम्बालाम्भारी" नाम के शिखर पर गए और समाधिस्थ हो गए जहाँ पहली बार बिना मल-मूत्र त्यागे एक ही आसान पर महायोगी जी तेरह दिनों तक समाधिस्थ रहे, जब इतनी लम्बी समाधी के बाद उठे तो जीवन कि धारा को एक बार फिर बदला हुआ पाया, इतना लम्बा समय बिना भोजन-पानी,मल-मूत्र के रह सकने कि अद्भुत क्षमता ने साधना जगत में महायोगी जी को और कुशल बना दिया, हालाँकि महायोगी जी इतना बताना भी उचित नहीं समझते, ये तो उन लोगो का भला हो जो महायोगी जी के साथ लगातार रहे और उन योग्य शिष्यों का जिन्होंने एक-एक घटना को प्रमाण सहित संजोया................
शीत ऋतू की बर्षा में भीग कर भी साधना के लिए जाते महायोगी जी  
ये बात भी लोग अच्छी तरह जानते हैं कि महायोगी जी को केवल बारह वर्ष कि आयु में ही गुरु पदवी पर महागुरु ने बिठा दिया था, और तभी से कुछ साधक महायोगी जी के शिष्य बन गए और उनके साथ रहने लगे, कुछ साधू और सन्यासियों ने तो ये दावा तक किया कि वो महायोगी जी के पूर्व जन्मों के शिष्य हैं, महायोगी जी के घर के सामने जमघट लगा रहता, परिवार को महायोगी जी कि स्कूली शिक्षा कि चिंता होती रहती थी, लेकिन कोई उपाय ही नहीं था, इन साधकों को परिवार वालों ने गाली-गलौच कर भगाया भी, लेकिन दो-तीन दिनों में ही फिर आ जाते, समस्या कम होने का नाम ही नहीं ले रही थी, एक ओर जहाँ कुल्लू में स्थित देवताओं के सामने होने वाली बलि प्रथा को रोकने के प्रयास के कारण जहाँ सामाजिक रूप से महायोगी के अनेक शत्रु तैयार हो गए थे, वहीँ क्षेत्र का जातिवाद महायोगी के परिवार पर भारी पड़ने लगा, महायोगी जी के कई शिष्य जाति में बहुत छोटे होने और स्वयं महायोगी जी के उच्च कुल में होने के कारण साथ सहभोज एवं पूजन, यज्ञ, साधना का विरोध होने लगा, महायोगी जी के परिवार को विरादरी कि चुनौतियों का सामना करना पड़ा, जिस कारण महायोगी जी ने घर छोड़ कर बाहर रहने का निर्णय कर लिया, ताकि परिवार को कोई परेशानी न हो, यही सोचकर महायोगी शिष्यों सहित "बालीचौकी "नाम कि जगह पर ही माता काली कि प्राचीन गुफा में रह कर तप करने लगे, यहीं महायोगी जी को "माता रानी" ने साधारण स्त्री के रूप दर्शन दिए और महायोगी जी से प्रसाद मांग कर ले गयीं, लेकिन काफी देर तक उनको पता ही नहीं चला, जब तक भान होता देर हो चुकी थी, अब तो इस घटना ने महायोगी जी पर नया जनून सवार कर दिया कि मुझे मातारानी से मिलना है, महायोगी जी ने भोजन त्याग कर वहीँ साधना करनी शुरू कर दी, मंत्र जप करते रहते, यज्ञ करते रहते, लेकिन बात न बन सकी, महायोगी कमजोर होते चले गए, उनका स्वास्थ्य तेजी से गिरने लगा...............
इसी गुफा में महायोगी जी ने काफी समय तक रह कर तप किया
कहा जाता है कि यक्षिणियों....की सिद्धि महायोगी को जन्मजात थी, जोगिनियों की कृपा से महायोगी हिमालय के सबसे बड़े योगी बने थे, कौलान्तक पीठ की अधिष्ठात्री देवी माता कुरुकुल्ला की सिद्धि ने महायोगी को मानवीय सीमाओं से परे कर दिया था, पर माया थी कि महायोगी को अस्थिर किये जा रही थी, महायोगी जी कि ऐसी हालत हो गयी कि अब वो बैठ ही नहीं पा रहे थे, माता-पिता भी बेटे कि ऐसी हालत देख कर गुफा दौड़े चले आये, महायोगी जी यहीं से पवित्र हंसकुंड तीर्थ की चौदह दिनों की यात्रा पर चले गए, ऐसी हालत में जाना सबको मंजूर नहीं था, पर हठयोगी के सामने किसकी चलती, महायोगी जी यात्रा पर नंगे पवन निकल पड़े और अनेक कष्टों से भरे मार्ग को पार करते हुए दिव्य हंसकुंड तक पहुंचे और वहां से भी ऊपर सकती नाम के पर्वत शिखर तक पहुंचे, जहाँ दो दिन की साधना कर महायोगी जी पुन: घर की और लौटे, लेकिन घर आने के लिए नहीं बल्कि उन दो दिनों की साधना ने महायोगी जी को और भी तंग कर दिया था, महायोगी जी घोर तप का निर्णय मन ही मन कर चुके थे, अपने संकल्प को पूरा करने के लिए, पहले महायोगी जी घर लौटे, यक्षिणियों का आवाहन कर उनको पूछा की बताओ माता के दर्शन कैसे हो सकते हैं....उनहोंने कहा की इसके लिए तो घोर तप करना होगा....महायोगी जी ने कहा मैं तैयार हूँ....यक्षिणियों ने ही बताया की महायोगी जी आपको इसके लिए "गरुडासन" पर्वत पर जा कर ही साधना करनी होगी ये स्थान तो काफी दूर था....महायोगी ने कहा ये तो जोगनियों का दिव्य स्थान है....महायोगी जी पहले भी वहां जा चुके थे....अब महायोगी जोगिनियों का आवाहन करने लगे.......जोगिनियों ने महायोगी को कहा की तुम निश्चिन्त हो कर आओ हमारे रहते तुम्हारा बाल भी बांका नहीं हो सकता......महायोगी जी ने आपने कुल देवता श्री शेष नाग जी की अनुमति ली....साथ ही माता तोतला जी की भी......अपने सभी पूर्वजों को प्रणाम कर आशीर्वाद माँगा....लेकिन जाने से पहले दो बड़ी अड़चने सामने आ गयी....................................
हिमालय की अति वशिष्ठ एवं पवित्र दिव्यतम हंसकुंड पर्वत घाटी 
पहली अड़चन तो ये थी की महायोगी के पैतृक घर के साथ वाले पर्वत "जोगिनीगंधा" की देवी भ्रामरी इसके लिए मान नहीं रही थी और साथ ही "सुवर्णकारिणी माता देवी चवाली" भी आज्ञा नहीं दे रही थी महायोगी जी जानते थे कि "सुवर्णकारिणी माता देवी चवाली" को मनाना बहुत ही आसान है, लेकिन "जोगिनीगंधा" पर्वत की देवी भ्रामरी सरलता से नहीं मानने वाली, तो पहले महायोगी जी इसी परवत पर चले गए, इस पर्वत पर साधना के लिए बैठते ही बबाल शुरू हो गया, गांव कि मान्यता के अनुसार यहाँ कोई रात को नहीं रहता सदियों से कोई रहा भी नहीं था, लोग इस स्थान को बहुत ही पवित्र मानते हैं, लेकिन महायोगी जी के दिन-रात वहां रहने के कारण लोग भड़क गए, और समूह बना कर महायोगी जी को धमकाने पहुंचे लेकिन महायोगी जी ने उनको कड़ाई से कह दिया कि वो बिना साधना पूरण किये कदापि नहीं जायेंगे, कहा जाता है कि इस देवी के क्षेत्र कि रक्षा कोई "लंगड़ाबीर"नाम का देवता करता है, जो भालू या शेर जैसा रूप बना कर लोगों को मार देता है, लेकिन जो हिमालयों और बनो का सम्राट हो उसको भला क्या भय, महायोगी जी करीब सात दिन वहां रहे और अन्तत:,करुणामयी माता प्रसन्न हुई, उनहोंने आकाश मार्ग से महायोगी जी को मौली बस्त्र का टुकड़ा और कुछ दिव्य पुष्प दिए.....................
     जोगिनिगंधा पर्वत का आधार से लिया गया सम्पूर्ण चित्र 
आप सोच रहे होंगे कि ये तो बिलकुल ही अवैज्ञानिक बात है कि हवा में कोई चीज कैसे आ सकती है, ये वहां के लोगों के लिए चमत्कार नहीं सैंकड़ों लोगो के सामने होने वाली मामूली सी दैविक क्रिया है, यहाँ का बच्चा-बच्चा इस तथ्य को भली भांति जानता है, सैंकड़ों लोग इसके प्रत्यक्षदर्शी भी है, महायोगी जी इस स्थान से लौटते हुए ही "सुवर्णकारिणी माता देवी चवाली" के बन में स्थित मंदिर में पहुंचे, इस माता का बन छोटा सा ही है लेकिन वहां के बृक्षों को कोई लोहा नहीं लगता, जंगल कटा नहीं जाता इसी कारण बचा हुआ है, इसी बन के मध्य से बहुत ही ऊँचाई से पानी का झरना गिरता है, इस झरने कि जहाँ से शुरुआत होती है वहीँ माता जी का छोटा सा मंदिर है, वहां पहुँच कर महायोगी सत्येन्द्र नाथ जी ने माता को केवल स्तुति करके ही प्रसन्न कर लिया, माता चवाली ममतामयी कोमल हृदया हैं, यही वो देवी हैं जिनके पास मृतसंजीवनी एवं पर्णी नामक बृक्ष भी है, (जिससे सोना बनाया जाता है) जैसी दिव्य औषधियां हैं, लेकिन मान्यता के अनुसार इन औषधियों को अदृशय रखा गया है, माता कि कृपा से ही ये प्राप्त हो सकती हैं, महायोगी जी माता का आशीर्वाद ले, अपनी "गरुडासन पर्वत" कि महासाधना के लिए अब तैयार थे................
चवाली माता का झरना जिसके मुहाने पर स्थित है माता का मंदिर 
महायोगी जी कठिनतम यात्रा कर गरुडासन पर्वत तक पहुंचे और और शुरू की अपनी सबसे बड़ी साधना, इस साधना के बारे में मैं नहीं बता सकता, जानता तो हूँ पर यही महायोगी जी के जीवन का सबसे अहम् पड़ाव है, इसी पर्वत पर महायोगी जी को माता रानी के न केवल दर्शन हुए बल्कि आज तक जो इतिहास में सुना भी नहीं गया, मातारानी के साथ लगभग तीन घंटों से अधिक कि अवधि तक महायोगी जी रहे लेकिन महायोगी नहीं जानते थे कि वो किस से धर्म चर्चा कर रहे हैं, अंतिम कुछ क्षणों में माता ने स्वयं ही कह दिया, कि तुम मुझसे मिलने यहाँ आये थे, तो देख लो मैं ऐसी हूँ, और करीब सात मिनट तक वहां रह कर देवी ने बिदा ली, आप ये कल्पना करने न लग जाएँ की कोई आठ भुजा वाली मुकुट धारण किये शेर पर सवार हो कर प्रकट हुई और अदृशय हो गयीं, ऐसा कुछ नहीं हुआ, महायोगी जी 26 दिनों तक बिलकुल भूखे रहे होंठ और चमड़ी जगह जगह से फट गयी थी बहुत ही तेज बुखार हो रहा था, दो दिनों से महायोगी हिले तक नहीं थे, अब महायोगी जीने की उम्मीद छोड़ चुके थे, ऐसे में उन्हें मूत्र त्याग की इच्छा हुई, घसीटते हुए कुच्छ दूरी तक गए, कुछ बूँद मूत्र त्याग किया, वापिस कन्दरा की और लौटने लगे तो बेहोश हो कर गिर गए, तभी एक गांव की महिला वहां जड़ी बूटियाँ ढूढती हुई पहुंची, उसने महायोगी को उठाया और पानी पिलाया, फिर लताडती हुई पर्वत के ऊपर ले गई क्योंकि ठण्ड के कारण महायोगी जी का शरीर अकड़ गया था, ऊपर धूप थी, वहां धूप में लिटा कर महायोगी जी से घर का पता पूछने लगी और कहने लगी की तुम यहाँ अकेले क्या कर रहे हो, जानते नहीं की यहाँ खतरा है, इतनी ऊंचाई पर तो जानवर भी जिन्दा नहीं रहते, जब महायोगी जी ने कहा की वो माता भगवती को मनाने के लिए आये हैं, तो वो औरत कहने लगी माता तो दिल में होती है, आत्महत्या करके नहीं मिलेगी अपने घर चले जाओ, लेकिन महायोगी बोले की मैं जानता हूँ कि दिल में प्रेम और भक्ति होनी चाहिए पर शायद इतना काफी नहीं, इसी तरह समय तीन घंटे बीत गए, जब महायोगी जी बातो मैं ही उलझे रहे तर्क पे तर्क देते रहे, तो उस औरत ने अपनी गोद से गर्म तजा प्रसाद निकाल कर महायोगी जी को दिया और बोली देखो लो मैं ऐसी ही हूँ, महायोगी को उस स्त्री कि बातों मैं सच्चाई नजर आई, महायोगी जी ने अपनी दादी को बताते हुए कहा था कि दादी जी पता नहीं क्यों मुझमे उस औरत कि बात काटने का साहस ही नहीं रहा, वो जो कहती गई मैंने माना, लगा मानों सचमुच
    महायोगी जी का मनमोहक युवा रूप बहुत ही आकर्षक है
वो ही आदि जगदम्बा है, जैसे ही हल्का सा बोध हुआ, आँखों से आंसू बहाने लगे मैं दहाड़ दहाड़ कर रोने लगा, उनके सीने से लग कर रोता रहा, पलट पलट कर उनको देखता, उनको छू कर देखा, उनहोंने कहा मैं सदा तुम्हारे साथ ही हूँ, कुरुकुल्ला कि प्रतिमा का निर्माण करो, रथ बनायो (पहाड़ी कुल्लवी शैली कि प्रतिमा को रथ कहा जाता है) फिर माता उठी और कहने लगी ये प्रसाद तुम्हारे लिए और मैं खड़ा हो गया, वो उठी हाथ में दराती थी...और पहाड़ कि दूसरी और जाने लगी.....दिल तो कर रहा था कि मैं रोकू.....लेकिन हिल ही नहीं पा रहा था....थोड़ी देर मैं ठंडी हवा के झोंके ने अहसास दिलाया तो पहाड़ी कि तरफ भागा....दूर दूर तक कोई नहीं था....यहाँ तक कि जंगल तो बहुत ही दूर थे केवल नग्न रिक्त परवत ही था....महायोगी काफी देर रोते रहे.....अचानक हसने लगे...उनको याद आया कि शायद बुखार दिमाग मैं चढ़ रहा है या इतने दिनों से भूखे होने के कारण मौत से पहले हेल्युसुनेशन हो रहा है....भला ऐसा कैसे हो सकता है कि अभी माता आई थी.....अपने को महायोगी जी ने बहुत समझाया....लेकिन तभी हाथ पर रखे प्रसाद पर नजर गई.....जिसकी गर्मी हाथों को महसूस हो रही थी.....महायोगी जी ने प्रसाद ग्रहण किया.....लेकिन आज तक भी महायोगी इस बात को मान ही नहीं पाए कि सचमुच वो भगवती ही थी....लेकिन महागुर को इस बात का पता चलते ही वो भी गरुडासन पहुंचे......महायोगी इतना होने पर भी भ्रम ही मान रहे थे....तो साधना आगे जारी रखने कि जिद्द पर अड़े थे......महागुरु के समझाने बुझाने पर ही लौटे....हम सब तो यही मानते है कि वो भगवती ही थी......केवल महायोगी जी को छोड़ कर....दादी जी का भी यही माना था.....देवी कुरुकुल्ला कि काल एक धातु प्रतिमा ही थी.....जो प्राचीन है....लेकिन बड़ी मूर्ति जिसे रथ कहा जाता है...तैयार नहीं किया गया था....घर आने के तकरीबन 6सालों के बाद ही महायोगी ने अपना वादा पूरा कर कुरुकुल्ला देवी का रथ बना कर तैयार करवाया....धन का अत्यंत अभाव होने के कारण महायोगी जी माता की प्रतिमा को मनोवांछित स्वरुप नहीं दे पाए लेकिन भविष्य में धन कि व्यवस्था होने पर ऐसा करेने का मन बना माता कि मूर्ती को तैयार किया गया......आप भी जगतकल्याणी माता कुरुकुल्ला जी के दर्शन कर लीजिये.................
  कौलान्तक पीठ में स्थित माता कुरुकुल्ला कि अस्थाई प्रतिमा 
कहते हैं कि कलियुग में कोई भी अति पवित्र हो ये हो ही नहीं सकता, जब राजा परीक्षित जैसे महारथी भी कलियुग से बच न सके तो अन्यों कि विसात क्या? यही सोच कर महायोगी अपने महागुरु के पास गए और उनसे कहने लगे कि मेरे जीवन में न जाने क्या-क्या घटा हैं? मन:स्थिति जितना संभालना चाहूँ रह रह कर फूटती है, मुझे लगता है कि पर्वतों को रौंद दूँ, आकाशों में उड़ जाऊं, संसार में जितने लोग पाप फैला रहे हैं उनको जा कर सबक सिखाऊं, पता नहीं क्यों दुनिया में कमियाँ ही बहुत नजर आती हैं, महागुरु ताड़ गए कि कुण्डलिनी शक्ति के उर्धवमुखी गति के कारण इस तरह के भाव पैदा हो रहे हैं, महायोगी जी को महागुरु ने कुछ दिन अपने पास ही ठहरने को कहा, लेकिन महायोगी जी कि बैचैनी बढ़ती ही गयी, यहाँ ये बताना आवश्यक है कि महायोगी जी निद्राजई हैं, अपनी नींद पर उनका मनचाहा नियंत्रण है, लेकिन बैचैनी के कारण उन्हें, कुछ होने लगा, हाथ पाँव कांपने लागे, शरीर पर नियंत्रण नहीं रहा, कभी जोर-जोर से साँसे भीतर खींचते, तो कभी बाहर छोड़ देते, भस्त्रिका प्राणायाम कि भांति सांस लेते-लेते अचानक जमीन पर लोट-पोट होने लगते, कूदते, चिल्लाते, जोर-जोर से हँसते, फिर रोने लग जाते, जब हालत बहुत ही ख़राब हो गए तो महागुरु ने एक बड़ा पत्थर नाले के पास देख कर महायोगी जी को कहा कि इसे गुफा तक ले जाना था पर कैसे हममेसे तो कोई भी इसे हिला नहीं सकता, तुम्हारे बाकि गुरुभाइयों को भी कहना पड़ेगा, कह कर महागुरु गुफा कि और चले गए, महायोगी जी के अन्दर शक्ति का उबाल सा आ रहा था, महायोगी जी ने उस पत्थर को पलटना शुरू किया, अकेले ही वो भी चढ़ाई में, खुद पत्थर के नीचे, मानों आत्महत्या करने का पूरा बंदोबस्त कर रखा हो, पर मने नहीं पलते गए, तब तक बाकि गुरु भाई भी पहुँच गए और पत्थर को गुफा तक ले गए, पत्थर पर बल लगा कर महायोगी जी को बहुत ही शांति अनुभव हुई, जैसे ही बैचैनी बढ़ती महायोगी जी पत्थर पलटना शुरू कर देते, फिर महागुरु ने महायोगी जी के सर पर बर्फ के पानी से भीगा हुआ कपड़ा रखा और पावन को आग से गरम करने लगे, दोनों गुरुभाइयों ने हाथ कस कर पकड़ लिए और दो गुरुभाई चिकनी मिटटी जिसमें कुछ औषधि मिली हुई थी महायोगी जी के पीठ पर रगड़ने लगे, महायोगी कि हालत मरते हुए प्राणी जैसी हो गयी, लेकिन कुच्छ देर बाद महागुरु ने नेत्रों से महायोगी जी पर शक्तिपात किया, और महायोगी जी योग निंद्रा कि अवस्था में चले गए................
  हिमालय में एक सूखे छोटे वृक्ष पर महायोगी सत्येन्द्र नाथ जी 

इस तरह महायोगी जी को अद्भुत कुण्डलिनी जागरण का रहस्यमयी लाभ प्राप्त हुआ, महायोगी जी उठे और त्रिबंध लगा कर घंटों समाधी में बैठने लगे, अब महायोगी जी कि चलने कि गति अचानक बहुत तेज हो गयी, काम करने कि गति भी बहुत तेज हो गयी, बात भी महायोगी जी जल्दी जल्दी करने लगे, स्वभाव में इन परिवर्तनों ने महायोगी जी को बदल कर रख दिया, धीर गंभीर महायोगी चपल हो गए, हसने खिल खिलाने लगे, बहुत बोलने भी लगे, अब महागुरु ने उन पर अंकुश लगाने के लिए सबसे विचित्र उपाय निकाला, ये उपाय था कि महायोगी जी को ऐसे बस्तर पहनाये जाएँ जिनमे स्त्रियों के गुण हों, ताकि महायोगी जी के भीतर उमड़ रहे पुरुष को अति पुरुष होने से रोका जा सके अन्यथा महायोगी पेड़ कि चोटी पर होते, कभी पहाड़ी के बीच में, कभी ऊँची छलांग लगा रहे होते, नदियों में कूद पड़ते, यहाँ तक कि चारो ओर आग जला कर बीच में बैठ जाते, सापों को पकड़ लेते.....................
  बाल्यकाल में महायोगी जी जंगल से गीदड़ पकड़ कर ले आते 
जंगल से गीदड़ पकड़ कर लाते, अब क्या क्या बताऊँ, ऐसी ऐसी माया है कि बताई भी नहीं जा सकती, इस घटना के कारण जंगली जीवों से महायोगी जी कि मित्रता हो गयी, एक बार तो महागुरु को इतना क्रोध आया कि महायोगी जी कि डंडे से खूब पिटाई हुई, महायोगी जी सबसे ऊँचे देवदार के बृक्ष पर चढ़ गए ओर सबसे ऊँची टहनी पर पाँव मोड़ कर रस्सी से बांध दिए और उलटे लटक गए, यदि थोड़ी सी चूक हो जाती तो गहरी खाई में जा गिरते, जहाँ से हड्डियाँ लाना भी संभव नहीं था, महागुरु ने खूब लताड़ा और कहा ये हाल हैं हिमालय के सबसे बड़े योगी के,  और मार मार कर हड्डियाँ ढीली कर दीं, कहा तुमारा काम जीवो की रक्षा करना है न की उनको प्रताड़ित करना, तबसे जंगली जानवरों को शायद रहत मिली, ये महागुरु का ही दिया संस्कार है की आज महायोगी जी वन्य प्राणियों के संरक्षक के रूप में मने जाते हैं, लेकिन कुछ चीजों पर शायद कोई खास असर नहीं हुआ, महायोगी जी अब भी छुप-छुप कर बड़े-बड़े पत्थरों और चट्टानों पर चढ़ते रहते हैं, आज का "राक क्लाइंबर" भी शरमा जाए, महायोगी जी को तुरंत औरतों की साड़ी जैसे वस्त्र पहना दिए गए, जिससे बहुत कुछ अंकुश तो लगा, पर राज कि बात ये है, कि ये घटना क्रम अब भी जारी हैं, कहते हैं कि महायोगी जी के अन्दर कोई पुरुष रसायन कुण्डलिनी जागरण के कारण अनियंत्रित हो गया है, जिस कारण वो इसी रासायनिक दवाब में आ कर ऐसी-ऐसी दुसाहसिक क्रियाएं करते हैं, पर सत्तर प्रतिशत तो उनको बस्त्रों ने ही रोक रखा है, हालाँकि बात जंचती नहीं है, पर इससे सिद्ध हुआ की वस्त्र भी जीवन शैली पर गहरा प्रभाव डालते हैं, बाकि गहरी बात तो मनोवैज्ञानिक ही जान सकते है की महागुरु ने ऐसा क्यों किया, ये है महायोगी जी के विचित्र वस्त्रों का असली भेद, हालाँकि अब महायोगी जी ने इन सब पर काफी हद तक रोक लगा ली है, पर जंगल के शेर के बारे में कुछ कह पाना मुश्किल ही है, जब भी हिमालय जाते हैं तो फिर पकड़ना स्वप्न ही है, हमें प्रार्थना करते हुए ही कि धीरे चलिए कहते कहते साथ चलना पड़ता है................
महायोगी की भेष-भूषा जिसे महागुरु ने जानबूझ कर पहनाया
महायोगी जी ने एक राजस्थान के बाजीगर से बाजीगरी कि परम्परागत कला भी सीखी, बस जंगलों में कभी हवा में उड़ कर दिखते तो कभी कुछ पैदा कर देते, लोग तो लम्बे समय तक ये ही समझाते रहे कि महायोगी जी हवा में आसन लगाते हैं, वो तो भला हो एक बच्चे का जिसने महायोगी जी से एक सार्वजानिक कार्यक्रम में पूछ लिया कि आप हवा में कैसे उड़ाते हैं, हममे से तो कभी किसी कि हिम्मत ये पूछने कि हुयी ही नहीं, तब महायोगी जी ने बड़ी शालीनता से बताया कि वो भी हवा में नहीं उड़ सकते ये सब तो केवल भ्रम हैं, भारत में जादूगरी को कौतुक विद्या कहते हैं, जो एक प्राचीन कला है, जिसे उन्होंने सीखा है, इसलिए मन बहलाने के लिए वो ऐसा करते हैं, लेकिन शायद बच्चा ये सुन कर संतुष्ट नहीं हुआ, उससे लगा महायोगी जी सच बोलना नहीं चाहते कि वो सचमुच उड़ते हैं, महायोगी जी ने बहुत समझाया पर वो नहीं माना, इससे महायोगी जी को अपनी भूल का एहसास हुआ कि वो जो कुछ करते हैं लोग सच ही मानते हैं, तब से वो हर कदम सम्भल कर चलने कि कोशिश करते हैं और उनहोंने कौतुक विद्या का प्रदर्शन बिलकुल बंद कर दिया...........................
       महायोगी जी का पेड़ के सहारे हवा में उड़ कर दिखाना 

हवा में कौतुक विद्या द्वारा काफी ऊँचा उठ जाते हैं महायोगी जी, हालाँकि अभी यहाँ ज्यादा फोटो उपलब्ध नहीं हैं, लेकिन महायोगी जी के कई चित्र बहुत ही अद्भुत है, इस पेड़ के भी महायोगी जी काफी ऊपर तक गए थे लेकिन जब तक कैमरा निकलता ऑन होता महायोगी जी वापिस उतर कर नीचे पहुँच गए थे, लेकिन आप चिंता मत कीजिये एक और चित्र देख लीजिये, महायोगी जी के तो चित्रों के भी भण्डार भरे पड़े हैं, ये सब आपकी आमानत ही तो है, मेरा प्रयास है कि मैं केवल सच लिखूं, मैं मनाता हूँ कि महायोगी जी मेरे प्राणप्रिय गुरु हैं, लेकिन कहीं भी मैं कोई असत्य तथ्य नहीं देना चाहता जो तथाकथित हो, हालाँकि बहुत सी बातें भूल गया हूँ, पर मुझे संक्षेप में ही बताने को कहा गया है, अन्यथा जी तो चाहता है कि बस महायोगी जी का गुणगान करता ही रहूँ, उनके अज्ञात बिबिध रूपों का वर्णन करूँ, इस चित्र में महायोगी जी काफी ऊपर उठ गए हैं, यहाँ एक प्रसंग याद आया कि जब महायोगी जी स्कूल में पढ़ते थे तो वहां भी महायोगी जी ने अपने सहपाठियों के मनोरंजन के लिए एक जादू का बड़ा कार्यक्रम किया था, जो बहुत ही रोमांचक रहा..
ये कोई महायोगी का चमत्कार नहीं केवल बाजीगरी का करिश्मा है
इस चित्र को देख कर लोगो ने कई तर्क दिए, किसी ने कहा कि लोहे की राड़ फसा कर फोटो खिचवाई गयी है, किसी ने कहा शायद पेड़ की टहनी पर ही बैठे हैं, किसी ने कहा कि कम्प्यूटर कि मदद से बना दिया गया होगा, लेकिन जब महायोगी जी ने कुछ साधकों को समझाने के लिए इसे स्वयं करके दिखाया तो बोलती बंद हो गयी, जबकि वो भी केवल भ्रम ही था, महायोगी जी नें कई साधकों को ये प्रक्रिया सिखाई भी है, पर अंततः महायोगी जी ने अपने आप को इस क्षेत्र में जाने से रोका, क्योंकि महागुरु कि फटकार उनको सदा ही याद रहती है, लेकिन थोड़ी देर के लिए यदि मुझे महायोगी जी स्वतंत्रता दें तो मैं भी यही कहूँगा, कि हे गुरुदेव आप करोड़ों साधकों कि आत्मा हो, उनको केवल आपसे ही आस है कि आप उनको सत्य पथ पर ले जाने में सक्षम हो, तो कृपया अपने लिए न सही, हमारे लिए आप खतरों से सदा दूर रहा करें, हम आपसे इतना प्रेम करते हैं कि आपको खरोच भी आ जाए तो हम पीड़ा अनुभव करते हैं, ईश्वर आप जैसे पुरुषों को सदा पृथ्वी पर भेजता रहे, हालाँकि महायोगी जी को कुछ नहीं हो सकता सब जानते है, पर हमारा प्रेम ये सब देख कर करह उठता है, आप स्वयं ही देख लीजिये कुछ चित्र कि महायोगी जी कहाँ-कहाँ रहते हैं..........

  सीधे खड़े चट्टानी पहाड़ पर चढ़ते महायोगी सत्येन्द्र नाथ जी                                                     बिना किसी सहारे के बृक्षों पे तेजी से चढ़ते महायोगी जी 
महायोगी सत्येन्द्र नाथ जी प्रकृति में कहीं भी योगासन कर लेते हैं                                                   झरने के तेज पानी के बीचों बीच खड़े हो कर साधना 


इन क्रियाओं को महायोगी जी केवल हड्डियाँ सीधी करना कहते हैं                                    कूद कर नदी नाले पार करना महायोगी जी की तीब्रता को दर्शाता है


 बृक्षों के माध्यम से ही महायोगी एक छोर से छोर तक पहुँच जाते हैं                                                       महायोगी जी झरने के बीच बैठ कर उद्दियानबंध लगाये हुए


ऊँची टहनी से नीचे देख कर ही सर चक्करा जाये पर महायोगी शान्त 
दैव प्रेरणा से ही ऐसे योगी धरा पर आते है पर उनको जान पाना जटिल है, मैं तो फोटोज में ही उलझ गया, ये सब तो आप महायोगी जी की फोटो एल्बम में भी देख सकते हैं, मेरा कार्य महायोगी जी के बारे में बताना है, मैं केवल ये जाताना चाहता था की महायोगी जी अमूल्य हैं, हमें उनकी अमुल्यता को समझाना चाहिए, महायोगी जी को पांडुलिपियों से बहुत सा ज्ञान प्राप्त हुआ, मौखिक रूप से ही उनको वेदादि का अध्ययन करवाया गया, ज्योतिष के कई रूपों को महायोगी जी जानते हैं, अनेक प्रकार के ग्रंथों का ज्ञान होने के साथ साथ उसे प्रायोगिक तौर पर भी महायोगी जी ने उतारा हैं, महायोगी जी का बाल्यकाल बहुत ही रहस्यमय रहा, उनके बारे में बताने के लिए यदि मुझे सेवा का मौका दिया जाय तो मैं पूरी पुस्तक ही लिख सकता हूँ, अभी तक कोई शिष्य कमरा ले कर महायोगी जी के साथ हिमालय की उच्च श्रृंखलाओं तक नहीं पहुँच सका है, महायोगी जी की सिद्धियों के बारे में कहा जाता है की बंजार नामक जगह के पर्वत "लाम्बा लाम्भारी" की देवियों ने महायोगी को त्रिकाल ज्ञान दिया, शिकारी (शाकुम्भरी देवी) देवी ने महायोगी को मायावी होने का बरदान दिया, "जोगिनी गंधा पर्वत" की देवी ने महायोगी को शक्ति छुपा कर मानवीय जीवन जीने को कहा, तभी से महायोगी जी अति मायामय मानवीय जीवन जी रहे है, महायोगी जी को सतयुग का वाहक भी कहा जाता है, राक्षस कुलोद्भूता मायामयी माता हडिम्म्बा ने महायोगी को कहा की वे अपना दुर्लभ ज्ञान कभी भी पूर्णतया प्रत्यक्ष न करे, केवल योग्य साधको एवं धर्मनुयाइयो को ही ये ज्ञान दें, यही कारण है की बहुत से लोग महायोगी को जानने उनके पास पहुंचे लेकिन उनकी माया को बहुत कम लोग भेद पाए, वे धर्म अध्यात्म की मूल बात न कर साधक को सदा तब तक उलझा कर रखते हैं, जबतक की साधक पर यकीन न हो जाए, योग्य न होने पर महायोगी उसे छोड़ देते हैं, इसके पीछे क्या रहस्य है ये अभी तक नहीं पता, आम तौर पर संत या महात्मा चाहते हैं कि लोग उनके पास आयें, उनके भक्तों कि लम्बी कतारें हों, उनके पास बड़े-बड़े मंदिर आश्रम और भी न जाने क्या-क्या हो लेकिन महायोगी जी कि ऐसी चाहत ही नहीं है, वो तो साधको को टिकने ही नहीं देते, जिसने लापरवाही दिखयी, उसकी तुरंत छुट्टी, ऐसे योगी के साथ बिरले शिष्य ही टिक पाते हैं और जो टिका रहा, ये बताने कि तो अब आवश्यकता ही नहीं कि उसने महायोगी जी कि कृपा से तथ्य प्राप्त कर लिया, हालाँकि में सबकुछ नहीं बता पाया, मुझे आदेश हुए है कि मैं आज ही ये काम समाप्त कर दूँ, काश एक दिन और मिल जाता तो आपको बहुत प्रमुख बातें बतानी रह गयी, लेकिन समाप्त करने से पहले ये जरूर बताना चाहूँगा कि
   महायोगी जी की प्रेममयी सुन्दर मनोहारिणी छवि के दर्शन 
कोमल बालक कैसे बन गया हिमालय का एक कठोर योगी? महायोगी जी को इक्कीसवें वर्ष में "कौलान्तक पीठाधीश्वर" बनाया गया, वो भी साधना और ज्ञान में सबसे श्रेष्ट होने के कारण व अनेकों विद्याओं के जानकार होने के कारण, हालाँकि महायोगी जी जगत कल्याण के लिए भी हिमालय छोड़ कर नहीं आना चाहते थे, वो अपने महागुरु जी सेवा में ही रहना चाहते थे लेकिन, एक दीं महागुरु ने उनको अपने पास बुलाया और कहा कि अब तो तुम कौलान्तक पीठ के पीठाधीश्वर हो गए हो सारे हिमालय के मालिक भी, अब क्या इच्छा है? महायोगी जी ने कहा कि माता पिता के लिए कुछ करना चाहता हूँ और परिवार के साथ रहूँगा, विवाह करूँगा और आपकी सेवा में हमेशा गुप्त ही रहना चाहूँगा, मैं नहीं चाहता कि कोई मुझे जाने, आज जब लोग मुझे जानते तक नहीं तो भी न जाने क्या-क्या कहते रहते हैं, अगर समाज में गया तो दुष्ट आत्माओं को सहन नहीं हो पायेगा, महागुरु ने कहा, तुम्हें कैसे पता कि समाज में दुष्ट आत्माएं हैं? महायोगी जी ने कहा मेरा अनुमान और अभी तक का साथ!............गलत ! महागुरु ने कहा इसी भारतीय समाज में कभी मैं पैदा हुया था, आज तुम पैदा हुए हो, कल हिमालय किसी और को भेजेगा, समाज दुष्ट नहीं अबोध है, जिसे हांकते हैं कुच्छ गलत हाथ, ये हाथ हर क्षेत्र में हैं और अगर तुम जा कर सुधारने का प्रयास नहीं करोगे तो तुम्हारा क्या लाभ, महायोगी जी ने कहा, गुरुदेव मैं ये सब नहीं जानता, बस मैंने जो फिसला किया है वो आपको बता दिया, महागुरु ने महायोगी जी को समझाने कि हर संभव कोशिश कि कि तुम्हें समाज मैं जाना ही होगा, लेकिन महायोगी जी ने भी कह दिया चाहे जो भी हो जाए, मैं नहीं जाऊंगा, ये मेरा काम नहीं, जब बात नहीं बनी तो महागुरु ने कहा ठीक है, तुम्हारी शिक्षा दीक्षा पूर्ण हुई, तुम आज से मुक्त हो, लेकिन एक नियम हैं, जो तुमको पूरा करना है, महायोगी जी ने पूछा क्या? तो महागुरु ने कहा कि मेरी गुरु दक्षिणा? महायोगी हाथ जोड़ कर खड़े हो गए कहने लगे गुरुदेव मेरे पास कुछ भी नहीं है...................
महायोगी किसी भी कीमत पर समाज में जाने को तैयार नहीं थे 
मैंने तो सब कुछ आपसे ही पाया है, मैं भला क्या दे पाउँगा, महागुरु बोले ये तो नियम है, देना ही पड़ेगा, अंततः महायोगी को मानना ही पड़ा, महागुरु ने कहा हिमालय का सन्देश ले कर जगत में जाओ, जिस कौलान्तक पीठ को लोग भूल चुके हैं उसकी गरिमा याद दिलाओ, जब तुम्हे लगे कि ये काम पूरा हो गया तो लौट आना, लेकिन कम से कम पंद्रह वर्षों तक मत लौटना, यही गुरु दक्षिणा है, हट फिर कर वही हुआ जो महागुरु चाहते थे, चरण स्पर्श कर महायोगी अपने घर लौटे, अपना सामान उठाया, अपने एक मित्र से 300 रुपये उधर ले कर निकल पड़े अपने "कौलान्तक पीठ" के महा अभियान में, यहाँ महायोगी जी के बारे में केवल इतना बता सकता हूँ, वे अलौकिक है, कहते हैं कि महायोगी जी को पूर्व जन्म का कोई एक अधूरा काम भी पूरा करना है, जिसकी हमे कोई जानकारी नहीं कि वो क्या है, यहाँ ये बताना बहुत ही जरूरी है कि महायोगी जी, सामाजिकता नहीं जानते, इसलिए दुनियादारी में उलझ जाते हैं, उनको कोई भी बातों में फाँस सकता है, बड़े ही सरल ह्रदय के हैं और खुद पर खूब हँसते भी हैं, लेकिन ऐसे में ये बात हम सबको परेशां किये है कि दुष्ट लोगों से हम उनकी रक्षा कैसे कर सकते है? यहाँ ये भी बता दूँ कि सन 2008 में महायोगी जी को ट्रक के नीचे कुचलने का प्रयास हो चूका है, 2008 में ही उनके भोजन में फिर से विषाक्त तत्व मिला कर उनको मारने का प्रयास किया गया, लम्बे समय तक बिस्तर पर रहने के बाद ही महायोगी जी ठीक हो पाए, फिर 2009 में उनको जान से मारे जाने कि धमकियाँ मिलने लगी, 2009 में ही उनके वाहन पर पत्थरों से हमला किया गया, जिसमे महायोगी जी बाल-बाल बच गए, हिमाचल के समाचार पत्रों ने ये खबर बड़ी प्रमुखता से छापीं, पुलिस में भी मामला दर्ज किया गया है, अब आप ही बताइए ऐसे में महायोगी जी कि रक्षा कैसे हो पाएगी? लेकिन महायोगी निश्चिन्त हैं, उनको इन सब घटनाओं से जरा भी अंतर नहीं पड़ा, अपने कार्यों में लगातार जुटे हैं, सचमुच सिद्ध योगी है इसमें लेशमात्र संदेह नहीं, आपके मन में ये प्रश्न जरूर उठ रहा होगा कि उन पर हमले होने का कारण क्या है, वो है समाज के कुछ अराजक तत्वों को बुराई फैलाने से रोकना, इन बातों को आप इसी साईट के नए लिंक में पढ़ सकेंगे, लेकिन अभी तो शुरुआत है, अभी आगे क्या होगा ये देखना है? ये उन लोगो का सौभाग्य है जो महायोगी जी के पास रहते हैं, कि वे एक महापुरुष के साथ जी रहे हैं, समाज के भी कुछ और लोग उनके साथ रहते तो हैं पर माया का पर्दा जो माता भ्रामरी ने ड़ाल रख्खा है उन्हें उनसे दूर रखता है.........................
श्रद्धेय महायोगी सत्येन्द्र नाथ जी के दिव्य चरण कमलों के दर्शन
पर शिव और माता के भक्तों से महायोगी नहीं छुप पाते, वे उनकी माया तोड़ कर उनको पहचान ही लेते हैं, कौलान्तक पीठाधीश्वर के रूप में जबसे वे प्रतिष्ठित हुए है, कौलान्तक पीठ गुप्त रहस्यों के आवरण से निकल आया है, आज विश्व इनके कारण ही कौलान्तक पीठ को जान रहा है, वो दिन दूर नहीं जब हिमाचल का कुल्लू क्षेत्र करोडो लोगो के आकर्षण का केंद्र हो जायेगा, आज ही विश्व के कोने कोने तक ये सन्देश पहुंचना शुरू हो गया है, हिमाचल के साथ साथ भारत के नाम की धर्म पाताका फिर लहरा रही है, शायद यही महायोगी जी का अति संक्षिप्त परिचय है, मेरी आप सबसे पुनः प्रार्थना है कि, यदि कहीं कोई गलती जाने अनजाने हो गयी हो तो आप सब मुझे करबद्ध क्षमा कर देंगे, हिमालय के ऐसे दिव्य योगी का वृत्तांत लिख पाना या कह पाना सरल नहीं है, पर मैंने चेष्ठ कि है, में कौलान्तक पीठ कि टीम का धन्यवादी भी हूँ, कि उन्होंने मुझे इस काबिल समझा कि में श्रद्देय महायोगी जी कि महिमा को चंद शब्द दे सकूँ..............................

.........ॐ नम: शिवाय.......
-योगी लखन नाथ

In English



Paean offered to lotus feet of Shree Guru

Guru himself is the creator, sustainer and the destroyer. He is verily the Parabrahma (transcendental divinity) . My reverential salutations to that glorious teacher.


The essence is meditation is the form of guru, 

the essence of all worship is of the holy feet of guru | 

The basis of all mantra are the words of guru, 

and the only bestowal of liberation is guru's grace || 

My Salutations to that Guru who revealed to me that Truth, which is unfragmented, infinite whole, timeless divinity, and which pervades the entire universe – movable or unmovable.

My salutations to the Supreme Conscious bliss, who bestows highest happiness, the universal self and the embodiment of absolute knowledge, free from all dualities, expansive like the cosmic sky, embellished and indicated by great saying like “Thou art that”

The eternal one, and always in every now, without any fluctuations – still, everyone and everywhere, the witness of the elementals and of the mind, the one who is above the world of emotions, and free from three gunas(satva, rajas, tama), I salute you O SatGurudev!

O God! You alone are my mother, my father, my brother, and my friend. You alone are the knowledge, my real wealth. You are everything for me. You are verily my everything my dear God.



https://sites.google.com/a/kaulantakpeeth.org/www/mahayogi-satyendranath/Kaulantak_Peethadheeshwar_Maha_Yogi_Satyandar_Nath_JI_Maharaj-1.jpg?height=373&width=400
Divine vision of Lord of the Five Seats of Knowledge(Panch Peethadeeshwar), Supreme Leader of Kali Kul, Lord of Kaulantak Peeth Mahayogi Satyendra Nath Jee Maharaj (Son of Himalaya)



Brief biography of revered Shree Kaulantak Peethadheeswar Satyendra Nath Jee Maharaj

Writing about Kaulantak Peethadheeshwar MahaYogi Satyendra Nath ji is like trying to encapsulate ocean in a cup which is impossible except for a magician. However, it would be even more foolish if I don’t say anything at all. I will make an attempt to share with you - whatever I could grasp with the limitation of my mind. Please forgive me for my mistakes.

This story begins in 1983 when appearance day of Shree Krishna (Janmasthami) was being celebrated across the world. It most probably was the night of 23rd august. When the dark night was giving way to Brahma Muhurta(auspicicious time) , that was when the source of divine light for millions of disciples, Mahayogi Satyendra Nath Jee Maharaj manifested in this world. At that moment, mother nature seemed to have experienced a unique transformation which was sensed by few accomplished yogis and divine sadhaks of Himalaya. By the inspiration of God, they received the great message of his avatar. Mother Nature was peaceful, and with the first light of dawn bursting forth through the dark clouds of the night the message of incoming son of Himalaya resounded!

At gross level of reality, that day did pass like just another ordinary day. Larji was the place in kullu Himalaya, which is a tiny Himalayan village with only few houses, where Mahayogi ji took birth. But his birth was noticed immediately by Supreme jewel of Kaulantak Peeth Mahaguru Shree Siddha Siddhant Nath Jee Maharaj. We all are aware of the mystic grandeur of Himalayan yogis. Mahaguru Shree Siddha Siddhant Nath Jee Maharaj, who has also been an adept at Surya yoga, was in unbroken samadhi in a solitary cave far from human civilization since the age of 22 without food and water. The moment he sensed the avatar of Mahayogi ji, he broke his samadhi, looked for the opportune moment and waited for Mahayogi ji to grow up.

While Mahayogi ji was growing up in a regular family, his naming ceremony happened and he was named Satyendra Nath, born in moon sign of Aquarius (kumbha rashi) under constellation of Satabhisha . However, when his name appeared difficult to utter for his grand mother, she started calling him Satish and Satya. But since 'Satyendra Nath' was the name given by the family priest, he was addressed by both the names.

The ancestral home of Mahayogi ji is called Dharakhari which is in kullu. This village was far from the connectivity of roads at that time, and people had to climb steep hills to get about. Along with traditional farming that family has been involved in for generations, Mahayogi ji’s father was also a postmaster in Indian Postal Service. The difficult mountain life can shake even the most brave ones, but his mother was adept at working in the steep farming fields. While playing with his mother in the field, the idea of farming based on ancient Vedic tradition started germinating inside him. Mahayogi ji’s grandfather had died before his birth, his grandmother who has special love for Mahayogi ji has been the pivot and head of the family. His uncle also lived in the same house. So, Mahayogi ji grew up in a big joint family. The family village has two major problems - no proper road access which did claim many lives of injured and sick people who could not be saved because of no road access to major towns/cities in critical times. However, after 2009 a dirt road has connected the village to the mainstream society. The other problem in the village is of water supply. There is only two very ancient step-wells serving the village, and one dries up during the summer months.





Mahayogi ji’s village which has only 15-20 homes 








Even though the village has a deep gorge and dried up ravine behind it, village ancestors chose this place because it is the area where holy seat of divine mother Totala (Totala Peeth) is situated. Maa Totala is a manifestation of Bhagawati Devi Maa Tara. There is a also a divine hill behind the village called JoginiGandha with presiding goddess Mata Bhramari- she manifests in the form of honey bee. Mahayogi ji’s home is a traditional home as per Himalayan style, which is a very big house with four stories. The presiding goddesses of this house are various Yogini Shakti of HamsaKunda. And the owner of this village is a Yaksha god named Khahari- on whose name the name of village DharaKhari derives from. This is where the renowned step-well named Kharibai is also located which belongs to the same Yaksha god of the village. When we hear such details it seems we are reading stories from the times of Mahabharat or Ramayan and not of this modern age but this is all true.



Kharibai, the step-well which according to a prophecy will dry up when sins in the village will increase 






This is the step-well where Mahayogi ji used to go to collect water for home. The Yaksha god of this step-well has made it clear that he will stop the water when the sins in the village will increase. There is another god called Vansheera who lives in the village. He is considered to be the protector of the forests. There is a temple dedicated to him in the village. So, Mahayogi ji experienced this kind of environment since childhood in his quest for complete knowledge. If we look at the chapter of his family then we will realize that his grandfather spent his entire life in service of the presiding god of the family (Kul devata) Shree Sheshnaag ji. His ancestral home was made in ancient times, however it is still livable. Let us look at this house made with architecture followed in those hills for ages.




Mahayogi ji’s ancestral home in Dharakhari village 






While describing his village, I forgot to mention that when Mahayogi Satyendra Nath Ji Maharaj was around 3 years of age, one tall sadhu baba with long hair and beard approached Mahayogi ji's father, and asserted that the child born in the house, who has a round disc imprinted under the left toe is his disciple from previous birth. And insisted on seeing him. Even Mahayogi ji’s parents had not seen the marking of circular disc on their child’s left foot toe. When they actually saw it, they were very surprised. Upon which the Sadhu baba demanded that the child be given to him. But then no parent would readily give up their child even with such an evidence. Finally, the argument between the parents and the sadhu baba gave way to an arrangement wherein sadhu baba will become the guru of the child after proper initiation but the parents will keep the child. This sadhu baba was no other than supreme jewel of Kaulantak Peeth, MahaGuru Siddha Siddhant Jee Maharaj! Thus Mahayogi became initiated in Siddha tradition of Himalaya at a tender age of 3. There is no photo of Mahaguru ji, only a sketch which Mahayogi ji worships sincerely. I am providing that sketch so that you can get some idea of Grand Master's apperance.




Supreme Crest Jewel of Kaulantak Peeth Revered Shree Siddha Siddhant Nath Jee Maharaj 









Mahayogi ji became initiation as per tradition and slowly his spiritual practices started at that tender age. This was when Mahayogi ji got knowledge of Tankari scripts, Bhoot Scripts, Dev scripts et al. Since Mahaguru ji didn’t know hindi script, mahayogi ji had to learn these scripts. Mahayogi ji then studied Yoga, Jyotish, Tantra, Mantra, Vaastu, Karmakand rituals, Yantra, Ayurveda, Ved, Puranas, Upanishads and went through various schools of tantra. And then at the tender age of seven, Mahayogi jee with his Gurudev went to the peaks of Himalaya for further spiritual practices. That was the start of him becoming the grand master yogi of Himalaya. With his guru, Mahayogi ji started visiting Uttaranchal (which didn’t exist at that time with this name), along with Himalaya in regions of Jammu & Kashmir. And along with Himachal - Leh Ladakh, various other snow capped mountains of the region became witness to the divine company of guru and disciple.

Upon seeing Mahayogi ji’s abilities on tough spiritual practices and penance, his guru asked him to go to other masters as well. So Mahayogi ji went one by one to thirty eight such divine masters to seek knowledge and continued refining his practices.

It is necessary to mention here that MahaGuru ji had three other disciples along with Mahayogi ji, him being the youngest of the lot. The eldest guru brother’s name is Kirit Nath, then Pragalbh Nath, then Shambhar Nath and the youngest of them all Satyendra Nath- the brightest of all. With guru's guidance and with the merits of penance in previous births, Mahayogi ji started becoming adept at all spiritual practices.

Let us now have a vision of young master yogi




Kaulantak Peethadheeswar Mahayogi Ji Maharaj in tender young age 









Knowledge of Mahayogi ji is so vast that it is well beyond our imagination. I remember when I first saw him I thought how can such a young boy claim to be a Himalayan yogi. I was laughing inside. His fragile body made me worry- lest it gets scratched, his fair complexion made him appear very sensitive and vulnerable. Because of his appearance it was hard to believe that he is a master yogi of such grand stature! I used to think it is impossible to find a true yogi, but I have realized today that we keep searching our own imagination in the world and that remains just an imagination with no connection to the truth. When I got the fortunate opportunity to stay with Mahayogi ji in Himalaya then I realized what a Mahapurush he actually is. Living a comfortable worldly life, I was used to criticizing others. I realized that one finds it difficult to climb a small hillock whereas Mahayogi ji climbs comfortably, laughingly, monumental snow peaks in freezing environment. It appeared as if the mountains exists only for him. It is my great fortune that I am his servant. I pray to god to give me Mahayogi’s divine company in all my births. When seekers of truth and true Dharma found darkness everywhere then in that thick dark environment, a light shone with divine inspiration in Mahayogi ji's form….




In dark age of Kali, the sun of divine knowledge burst forth in form of Mahayogi ji 


Only after receiving knowledge from gurus and doing touch spiritual practices and penance, Mahayogi ji transformed in the divine force of light. But there was a deliberate attempt to keep his accomplishments, siddhis, penance and spiritual practices hidden since these kinds of traditions are not common in Kullu area. Only Deoli styled dharmic tradition is followed by people in that area. The modern gurudom reached those areas only after attempts of few city dwellers, whose prime motive was to advertise their guru or the organization and who where far from truth but considered themselves on top of spiritual world. However, Mahayogi ji will not allow me to say such things, he says God sends guru to everyone as per their own status. If guru’s level is too high then the disciple will start doubting that guru. And only certain advanced disciples get the teachings without even being told explicitly. In kullu valley, certain divine practitioners do these spiritual practices incognito. Ordinary folks do not consider it a good thing to become a yogi. But slowly, people got the information about Mahayogi ji- who would sometimes be in deep forests, at times on mountains peaks. Only after some shepherds saw him at such remote places, the word about Mahayogi ji spread across the area.

As time went by, Mahayogi ji became adept in dancing, singing and other art forms of embellishment, along with Hatha Yoga, Ved Vedanta, and other set of skills grouped as 'sixty four kalas'. During this time, Mahayogi ji met many Siddha Yogis and benefited from their divine company. But it wasn’t easy to live in Himalaya. Staying against nature in such extreme environment made Mahayogi ji very fierce and intense. Living alone for extended period of time made him look very grave. Facing snow for long period of time in solitude is not an easy task. On top of it, Mahaguru ji gave him order to complete a special fast known as MahaChandrayana vrata.

Mahachandrayan involves living alone without seeing another human being for 10 months 16 days in deep Himalayan mountains without wearing any clothes!

Mahayogi ji was 14 years old at that time and had already faced a deadly bout of poisoning.


Mahayogi ji only picks such places for practice away from human civilization 



Eventually, Mahayogi ji became much better at everything in comparison to his guru brothers who were older in age in comparison, because of which, in their mind Kaliyuga entered temporarily; and out of jealousy, one evening they added a deadly poison from wild plant named Black 'Mahura' in his vegetable preparation. This poison actually contains 'Kalkuta' poision. Oblivious of all this, Mahayogi ji who loved his guru brothers immensely and could not even imagine them committing such an act, innocently ate the poisoned food. Very soon it started to take effect with acute pain in the stomach. Before Mahayogi ji could try to control this unbearable pain, he started vomiting blood. Unfortunately, that day MahaGuru ji had gone to some other mountain peak for his sadhana. Seeing Mahayogi ji in such adverse condition, the reality dawned on his guru brothers and they started repenting their action. They confessed that they poisoned his food only to teach him a lesson and not to cause any harm. Mahayogi ji who had knowledge of Ayurveda realized immediately the gravity of the situation and that it's difficult to survive after consuming that particular poison. So he retreated and started reflecting on his life and thought about his parents. Then one of his guru brother Shambar Nath lifted mahayogi ji on his shoulder and walked all night to take him to a place called Sainj, from where Mahayogi ji went to his home, later he was admitted in Kullu hospital. Thereafter realizing the slim chance of his survival, he was transferred to Chandigarh. While on way to Chandigarh, Mahayogi ji went in coma. His parents were with him. Fortunately, because of bad taste of the poisoned food, he didn’t consume it completely otherwise he would have left his physical body within two hours of eating it. Since in that region of north India, Chandigarh has a good hospital, it made sense to take him there. After sometime, waking up from his coma, mahayogi ji found himself to be alive.




Mahayogi ji saw the sun of his life setting on him…. 



These details were kept hidden from his parents and revered sister Manjusha ji stored the file with details on treatment away from everybody. Although Mahayogi ji’s life was saved but a new problem emerged. Till this date, his physical body develops some or the other complication. If he gets bruised and blood starts to spill then it would not stop. To cure this, Mahayogi ji’s guru of Ayurveda- Revered Shree Ved Muni Ji Maharaj gave some ayurvedic herbs. Mahayogi ji also checked his falling health with help of yoga practices. During this time two unfortunate incidents happened which left very negative impact on Mahayogi ji. There was a cow in Mahayogi ji’s ancestral home. Mahayogi ji cared for her immensly. He would feed grass, give water and caress her with his hands. That cow would watch the Mahayogi ji’s child play with love like a mother would tolerate her child's naughtiness! Sometimes mahayogi ji would play with her horns and hold her tail. One day his grandmother informed that the cow died and that she has called couple of people from the village to bury the cow in the ravine. Mahayogi ji went to watch it without telling his family and found out that those village folks didn’t bury the cow at all but just threw her body in the ravine. Mahayogi ji could not tell this at home because he didn't want to be put in a situation explaining why he went there in the first place. He again visited that site the next day afternoon and saw vultures tearing apart the dead cow. This sight disturbed him immensely. He started going there everyday, covering his mouth with a piece of cloth to bear the stench. In the end only the bones remained of the carcass which was a gory sight. This was a terrifying experience for the young Mahayogi ji, that the cow considered as mother,whose milk he used to drink ended up like that. When bad things have to happen they happen anyways. At his house he used to feed birds, one day he saw a dead bird at the feeding place which distressed him further. After these incidents he decided to go to Mahaguruji.




Mahayogi ji got really disturbed with the death of the bird 


Mahayogi ji undertook four days of treacherous trek walk in Himalaya to find Mahaguru ji. Since Mahaguruji doesn’t stay at one place, it was very difficult to find him. Wandering in Himalaya like that for days, Mahayogi ji finally met Mahaguruji and asked him various questions on death. And insisted on knowing secrets behind death and even gave ultimatum to Mahaguru ji that without knowing about death he will not do his sadhana anymore. Mahaguru ji tried to convince him otherwise telling that he has given him adequate knowledge from Puranas on death and related topics and asked him to use his intellect. Mahayogi ji who must have been driven by some unknown inspiration didn’t budge from his demand and stopped all his spiritual practices. Mahaguru ji seeing his disciple's stubborn attitude, told him that now only one solution can fully satisfy him. That is to see the previous births. Then there won’t be any more questions. He then warned Mahayogi ji that watching previous births will be a sad experience and after that experience, Mahayogi ji won’t be able to enjoy the world and that experience will further give rise to another problem in life wherein it would become difficult to know the difference between real and unreal in the world. But Mahayogi ji was unfazed even by this warning; seeing this Mahaguru ji became angry and showered Brahmapath which made Mahayogi ji unconscious. For five days and night he remained unconscious of his physical body and most certainly did see all his births but it must have given him more pain and sadness instead of making him happy. Nobody knows what all he saw but according to his ayurved guru revered Ved muni ji, mahayogi ji’s body of last birth is still buried like a mummy in himalaya because in kaulantak tradition, yogis do certain preparation before going in samadhi so that their body remain fresh and free from damage for two to three thousand of years. As a matter of fact, I am one of the fortunate disciples of mahayogi ji who has seen that body. But whenever Mahayogi ji is confronted with any question on this subject, he very skillfully avoids the topic, and upon further insistence he would get angry and claim he doesn't know anything about it.


Mahayogi ji climbing steep and vertical boulders in Himalaya 






So there is something to this mystery of reincarnation but nobody wants to give forthright answers. Because of this I want to fight with yogis of India that if there is any truth to this matter of previous births then why is it not taught to common man. Afterall it can only do good to people. If science would know about it then it would also benefit from this knowledge. But these are my personal opinion. And please don’t imagine that Mahayogi ji doesn’t get angry and is a very quiet saint or preaching like some Rishi from ramayan era, living in grass hut, wearing dhoti and beads, roaming in ashram with few disciples. People presume that saints should not get angry. In true sense, Mahayogi ji doesn’t really get angry but he creates the appearance of anger just to spread his illusory maya! Fools do not understand this subtlety and begin to criticize. This is the reason spurious saints can mislead people and people end up rejecting real saints. But maybe all this is necessary to keep divine and true saints away from the worldly troubles. Practitioners in Himalaya know him as extremely proud and angry son of god - great master of yoga satyendra nath ji! Please don’t ask me why it is like that. Maybe that’s the style of real yogis of himalaya.




Mahayogi ji infront of ayurveda guru shree ved muni jee’s cave 



Mahayogi ji’s family used to worry all the time watching him leave for extended period of time for his sadhana without informing anybody about his whereabouts. When his family would hear from other people that they saw him in icy areas of so and so mountain peak, his parents would get very worried. No mother wants to see her son in such adverse environment. His father did his best to make his life comfortable but Mahayogi ji was unable to be bothered about his family's worry. When such complaints from people increased about warning them not to send their son to such snowy areas otherwise he will die and that many have died in glacier or in land slides. His family tried to stop him from going to such difficult terrains but that didn't work either. He would still run away to glaciers and difficult mountain peaks which caused tension and constant arguments in family. Everyday there would be fights in home and his parents would blame each other and fight out of desperation. In my opinion it is true that parents want to do good and take care of their children and are ready to do anything for the welfare of the child. But in the case of Mahayogi ji they didn’t know that the child in their home is not an ordinary child but is the darling of millions of disciples, and is the greatest yogi of Himalaya. But parents out of attachment do not really see it that way. It is also important to mention that Mahayogi ji has a younger brother too who has taken initiation from him and is amongst his disciples.




Only a mahayogi can live on these peaks in winter 


Once it so happened that Mahayogi ji had just returned from Assam where he was sent by Mahaguru ji to study tantra and aghora sciences. There in an ordinary village lived one woman whom Mahayogi ji calls 'Maa Jayendra Bhairavi'. He went to learn from her. She is one of the gurus of mahayogi ji. She is so secretive that even her family, let alone the village folks are unaware that a woman staying amongst them is no ordinary woman but is the embodiment of highest knowledge of tantra and aghora. Even though she has never visited Himachal physically but knows Mahaguru ji because of her divine capabilities. I won’t be able to talk more on this subject.

Mahayogi ji has thirty eight divine gurus. It is not possible to talk about all of them here. Mahayogi ji found out that in the name of tantra and mantra, sacrificing animals, consuming alcohol and women exploitation etc are carried on which are not at all present in tantra. Earlier when he was told to go to Assam for tantra he refused. But Mahaguru ji asked him to go and told him that it will clear the misgivings about tantra, and that is what happened.

So when he was called by Mahaguru ji after his return from Assam, Mahaguru ji gave him permission and direction for samadhi. And told him that he has learned yoga more than enough and asked him go and try to implement in his life. After getting permission for samadhi, Mahayogi jee went to Lambalambaari peak and entered the state of samadhi. Then for the first time in his life, mahayogi ji sat in one asana for thirteen days- without even getting up to relieve himself. When he got out of samadhi he found the flow of life again transformed. After staying without food and water, and without the need for toilet, he became more adept in the world of sadhana. Mahayogi ji doesn’t consider it right to talk about it. God bless those disciples who stayed with him for long time and tried to compile these incidents along with evidence. Only because of their efforts, we are able to know such details of his sadhana.





Mahayogi ji going for his sadhana during rains in winter season 



It is also well know that at the tender age of twelve, he was made a guru by mahaguru ji. Since then some disciples started living with him. Some sadhus and renunciates claimed to be his disciples form previous births. There would always be a crowd in front of Mahayogi ji’s house. His family was worried about his schooling but there was no solution to all this. His family however did try to force these disciples away but then they would return back in couple of days. This issue was not away at all. Mahayogi ji’s attempt to stop animal sacrifice in front of gods in Kullu created many enemies. On top of it because of diverse background of his disciples, the local caste hierarchy was getting to be a problem on his family. Many of his disciples were of so called lower caste and mahayogi ji being of higher caste, his family had to face many such social challenges which forced Mahayogi ji to leave his house and stay elsewhere. To spare his family from all this trouble, he decided to stay at Baali Chowki which has an ancient cave of Maa Kaali. He started doing penance there and along with his disciples who stayed with him. It was in this cave that Mata Rani, the divine mother gave darshan to Mahayogi ji in form of an ordinary woman and took prasad (sweet offerings to the gods) from mahayogi ji and left without divulging her true identity. When Mahayogi ji realized the truth about the woman that she indeed was The Mother of the whole universe, he ran after her but by that time it was too late and she had disappeared. This gave rise to a fervent desire in mahayogi ji to have proper vision of the divine mother. He stopped eating completely and started doing extreme sadhana, chanting mantra, performing yagya but it didn't work to the extent of having vision of the divine mother, and on top of it his health started deteriorating very fast…..





Mahayogi ji did penance in this cave for a long time

It is said that mahayogi ji had siddhi of Yakshni since his birth. With grace of yoginis, Mahayogi ji became the grand master yogi of Himalaya. Siddhi of Devi Kurukulla who is the presiding goddess of Kaulantak peeth had helped Mahayogi ji to transcend the human limitations but it was only her maya that was making Mahayogi unstable to the extent that he wasn’t even able to sit properly. Hearing about his condition, his worried parents also came running to the cave. But Mahayogi ji left for the hallowed grounds of HamsaKund from his cave which was fourteen days of trek away. Nobody wanted him to leave in such weak health, but who can stand in front of a hatha yogi’s resolution. Mahayogi ji did reach HamsaKunda- barefooted, facing many obstacles and managed to get to the peak in Hamsakunda called Shakti. After two days of spiritual practice at that place his condition exacerbated further. But since he had already made a vow to do extreme penance for divine mother's vision, he first returned home and summoned the Yakshini and asked on the process to get a vision of The divine mother. They warned him it would take extreme penance, to which Mahayogi ji readily agreed. Then those Yakshinis adviced him to go to Garudasan mountain and do sadhana there. Mahayogi ji realized that it is the divine place of yoginis and is very far away. He was familiar with the place since he had gone there before. So he summoned the yoginis who manifested and reassured Mahayogi ji that as long as they are there nobody can cause any harm to him and advised him to do his sadhana without any worry. Then Mahayogi jee took permission and blessings from the presiding god of his family Shree Shesh Nag ji and from Totala Maa, and obtained blessings from all his ancestors. But two problems emerged before he could leave.



Distinguished, divine and pristine HamsaKunda valley in himalaya 


The first issue was that Devi Bhramri of JoginiGandha hill next to his ancestral village was not agreeing to this and neither the SuvarnKarini Mata Devi Chawali. Mahayogi ji knew that it was easy to please Mata Devi Chawali but it might not be easy to convince Devi Bhramri of JoginiGandha hill. So he first went to Joginigandha hill and started his sadhana to get blessings of Devi Bhramari . This caused huge ruckus in the village since according to the village tradition it is a sacrilege to spend the night on that hill. Seeing Mahayogi ji live all through day and night made the villagers very angry and they even came in a group to threaten mahayogi ji and make him go away. But Mahayogi ji asserted in a strong voice that he is not leaving until his sadhana is complete. It is said that this area of Devi Maa is protected by a god called LangraVeer who takes the form of Bear or Lion and kills people. But somebody like Mahayogi ji who is the king of Himalaya and jungles knows no such fear. Mahayogi ji ended up staying there for around 7 days until the compassionate mother relented and became pleased with his sadhana. She dropped few divine flowers and a piece of sacred cloth from the air route.




Picture taken from base of JoginiGandha mountain


You might be thinking that it is totally unscientific that how can something come from air route? But these things are not magic. For people living in that area it is an ordinary act of gods that happen all the time! Even little children are aware of such acts and millions are witness to such acts. After returning form this hill, Mahayogi ji went to temple of SuvarnKarini Mata Devi Chawali. She has a small forest belonging to her which is never disturbed, no tree is ever allowed to be cut. That is why it is still preserved. There is a huge water fall there and the small temple is located right at the mouth of the waterfall. Mahayogi ji made pleased her by singing praises and stuti towards her. Mother has a very soft heart. It is she who has two trees called Mrit Sanjeevani (life rejuvenating) and Parni (which is used to make gold) and many other divine herbs. But according to local beliefs these are kept invisible and can be obtained only by her grace. Mahayogi ji got her blessing and was ready for his maha sadhana. He started his journey for his great penance in Garudasan hills. 



Chawali maa’s waterfall at the mouth of which is her small temple 


After a difficult trek, Mahayogi ji reached Garudasan hill and started his biggest sadhana. I cannot tell about this sadhana much. I am aware of the details but I am not allowed. This was the most important juncture in Mahayogi ji’s life. He not only had vision/darshan of divine holy mother, but unique in the history, he spent around three hours chatting with her. Although for most part, even Mahayogi ji was not aware that he is actually discussing dharma with none other than the divine mother of the entire cosmos! At the end of the discussion, Mother said it herself that he had come there to meet her. She asked him to look at her and said that is how she looks. She then stayed there for further seven minutes and then left. You must not imagine that somebody with eight hands and wearing a crown on head, riding a lion manifested and then disappeared in thin air. Nothing fantastical like this happened. Mahayogi ji was without food for 26 days and his skin was ruptured from various places and had high fever. He was unable to move for 2 days and had given up hope for living. In this physical state, he had an urge to pee and tried to drag his body a little and peed a few drops but when he tried to return to his cave he fell unconscious. Then a woman from village came there looking for Himalayan herbs. When she saw Mahayogi ji in that condition, she kept on scolding him for his recklessness and dragged him to the top of mountain where there was some sun light since his body was stiff because of cold. After laying him down in the sun light she inquired about his home while scolding him gently as to what he was doing at such height in such dangerous environment where even animals don't come. Mahayogi ji replied that he was there to please Mata Bhagwati to obtain her darshan. The old village lady then stated that Mother is in the heart, committing suicide like this will not give anything and advised mahayogi ji to return home. Mahayogi ji replied that he knows bhakti and love is essential but maybe that is not enough. Like this three hours went by and Mahayogi ji found himself entangled in all this talk. Then that old lady took out hot sweet offerings (prasad) from her lap and and gave it to mahayogi ji and exclaimed- “Look, this is how I am!”. Mahayogi ji found truth in her words. Mahayogi ji told his grandmother that he wasn't sure why but he didn't have the courage to give any counter arguments to her and believed everything she said.




Attractive and youthful personality of Mahayogiji.

When it started to dawn on him that she is indeed the Divine Mother, tears started rolling from his eyes, he found himself in her arms and cried profusely in her peaceful and loving bosom. He would look at her sometimes, touch her to feel and then again cry his heart out. 

She said she is always with him. Asked him to make murti for Devi Kurukulla, construct ratha (idol of hilly kullu style is called ratha), then she got up and asked him to take the prasad and said it was for him. Mahayogi ji stood up immediately. After giving him prasad she started walking away towards the other side of the hill, Mahayogi ji had instant urge to run after her and stop her but he couldn't even move his leg and was just frozen in his step and stared at her. When the blow of cold wind made him realize what was happening, he ran towards the area where Mother went but then he couldn't see anybody in the whole area as far as his eyes could go. It was above the tree lines so there were no trees anywhere near the place, only naked slopes of the mountain. He could see far off but there was no trace of the Divine Mother in any direction. Mahayogi ji kept crying for a long time, then he started laughing. He thought maybe because of high fever he had hallucinated. When he became aware of hot prasad still in his hand, he partook from it. Till this day, he is not able to convince himself that the woman he saw was Maa Bhagwati. When Mahaguru ji came to know about it, he also came to garudasan hill. Mahayogi ji was not convinced and wanted to continue his sadhana. But when mahaguruji convinced him otherwise he returned. We all believe that she was indeed Maa Bhagwati, even his grandmother believes that it was Mother goddess.

At that time, there was only an ancient murti of Devi kurukulla made of metal and not a traditional ratha. Only after six years because of lack of funds, that Mahayogi ji finished the ratha as per his vision.




You all also have a darshan of the Mother Goddess Kurukulla Devi..... 




Situated in Kaulantak peeth Kurukulla Mata murthi 






It is said in kaliyuga it is impossible to be extremely pure. When someone like Raja Parikshit could not remain untouched by kaliyuga then who are the lesser mortals. Having such thoughts, Mahayogi ji went to Mahaguru ji and told him that a lot of things have happened in his life. He is trying to control his mind and mental states, but it keeps erupting every once in a while. He said he feels like crushing down the mountains or flying in the air. Sometimes he feels like teaching a good lesson to everybody in the world who are committing sins. And that he is only seeing faults with the world. It is important to tell here that mahayogi ji has conquered his sleep habits. He has full control over when he sleeps and for how long he would sleep. Mahaguru ji immediately understood that all this is happening because of kundalini shakti rising up. Mahaguru ji adviced him to stay with him for few days. But all this time, mahayogi ji kept becoming restless, because of which his hands and feet started shaking. Sometimes he would breath in with lot of effort, and will breath out forcefully. He would breath as if doing bhastrika pranayam! He would roll over the floor, laugh uncontrollably, then all of sudden cry or jump around. Once when situation became extreme, Mahaguruji looking at a big stone near a rivulet said aloud that this stone needs to be taken near the cave but it is so big that no one can even move it. And that he would perhaps ask all his other brothers to help him. Mahaguru ji went towards the cave afterwards to fetch his guru brothers. But Mahayogi ji was having this surge of extreme energy rising upwards, so off he went and started moving that stone on the steep climb to cave which was very dangerous act. But by that time, his guru brothers came and together they managed to take the stone to the cave. Mahayogi ji felt some peace after this this physical excersion. So whenever he would feel restless he would start to move that stone everywhere. Seeing such behaviour Mahaguru ji put an ice cold water drenched cloth on his head and started to heat his foot. His two guru brothers held his hands and other two started rubbing mud mixed with some ayurvedic herb on his back. Mahayogi ji felt like he is about to die but then mahaguruji did shaktipath through his eyes which sent mahayogi ji in yognidra.




Mahayogi ji on a small driedup tree in himalaya 









So like this Mahayogi ji experienced various mysterious benefits from the wonderous awakening of kundalini. He would sit up and after doing the three locks (tri-bandha) would go in deep samadhi for hours. His walking speed increased immensely. His work speed also increased tremendously. He started talking too fast. Like that so many changes in his various acts transformed his nature completely. Once grave, Mahayogi ji became jovial. He started laughing a lot and talking a lot too. To put a lid on his increasingly uncontrolled behavior, Mahaguru ji came up with a bizarre solution. He concluded that Mahayogi ji must wear clothes which has more feminine qualities, so that the male principle in Mahayogi ji which was erupting all the time like a volcano can be controlled. Otherwise sometimes Mahayogi ji would be found at treetops and sometimes at mountain peaks, sometimes he would be jumping from very high slopes, and at times diving in rivers, or he would sit with huge fire around him or go catch some snake or jackal in the forest.








In his childhood he would catch a jackal and bring home 






What all should I say, so much maya is there that not everything can be told. All this incidents did make his very friendly to wild animals though. Once Mahaguruji became so angry with his activities that he beat him up with a stick. The threshold it seems was the incident when Mahayogi ji climbed the highest deodar tree and from the top branch, he bent his legs and tied it with a rope and hung himself upside down. If there was any mistake in it, he would have fallen in such a deep gorge from where not even bones could be salvaged. Mahagurji castigated him severely that this is the condition of the greatest yogi of himalaya. And also clearly instructed him that his work is not to trouble wild animals but to protect them....Well, after that at-least all the wild animals must have breathed sigh of relief! It is the inculcated samskar of Mahaguruji that Mahayogi ji later became famous as wild life protector. But there are somethings which didn't change in him- like climbing mountain peaks and jumping across boulders enough to put any modern rock climber to shame! So without any delay he was made to wear feminine clothing which controlled things to an extent. It is said because of kundalini awakening, male hormones became unbalanced in mahayogi ji because of which mahayogi ji still does such unprecedented bold acts in mountains but 70% has been controlled by the feminine clothing. Only a psychologist will be able to tell fully but all this is mostly under control now. However, whenever Mahayogi ji visits himalaya with us, we have to constantly plead him to walk slowly. It is very difficult to catch up with his swift walks in himalaya!




Mahayogi ji's dressing style, deliberately imposed by Mahaguruji 






Mahayogi ji has also learned traditional Bajigari tricks from a trickmaster in Rajasthan. He would sometimes appear flying in the air, or materializing things. For a very long time everybody used to think that he is capable of sitting in yogic pose in air. We never had courage to ask him how he does it, but god bless that child who in one of his public program asked how he flies in the air. Then Mayayogi ji told very clearly that he can't fly in air and all that is just tricks. This science of tricks is an ancient science called 'Kautuk'. And he uses those tricks for his entertainments. That child was not satisfied with the answer and thought Mahayogi ji is not divulging the true information and is making excuses about tricks. Mahayogi ji tried hard to convince the child that it's all indeed just tricks, but the child didn't get convinced. Mahayogi ji then realized his mistake that whatever he does people believe it to be true even after him telling otherwise. Since then he is careful not to show such tricks in public..





Mahayogi ji showing trick of appearing to fly with help of a tree 



Using 'Kautuk', Mahayogi ji can lift himself up in the air very high. There are not many pictures available of him demonstrating such tricks. By the time we could get the camera out and click he landed back. But don't worry for you we have one picture. Please have a look at it. All these pictures are treasures belonging to you all. I have tried to write only the truth. Mahayogi ji is my dearest master more dear than my breath, but even then I would not present any false stuff here. I have forgotten a lot of stuff and been directed to give only summary. Otherwise my heart tells me to keep singing his glories here. Give elaborate description of his unknown forms. In this photo, Mahayogi ji has elevated himself quite a bit. I remember one such incident from his childhood that in school days Mahayogi ji presented a magic show for entertainment in his school which was very interesting and entertaining for all.







This is not magic just some very awesome tricks! 


Looking at this photo, people gave many different explanations, somebody said this picture has been taken by piercing an iron nail in the tree, somebody said he is sitting on some branch, some said it is manipulated using computer, but when Mahayogi ji showed it to a disciple this trick, then everybody became speechless. Although it was a trick and an illusion, it is very unique in the implementation. Mahayogi ji has taught this to many of his disciples also. But he didn't venture much in this area after he was scolded for this by Mahaguruji. But if Mahayogi ji will permit me some freedom for a while then I would definitely write that Oh dear master! You are the soul of many millions of disciples, they all have their hopes tied on to you only, you are fully capable of taking them on the path of truth, so if not for yourself, then atleast for all of us, please stay away from danger! We love you so much that a little scratch on you will give us immense pain. May god keep sending personalities like you all the time to this planet. Although we know nothing can happen to Mahayogi ji, but it is our love that shakes with terror seeing him perform such dauntless acts. You only see where all mahayogi ji lives..... 







Mahayogi ji climbing very fast this vertically standing hills without any support 








Mahayogi satyendra nath ji does yogasana anywhere in nature 



here doing sadhana in between fast flowing rivulet 




Mahayogi ji calls this as just bone straightening excersises! 



Crossing rivulets by jumping a long distance very fast 





Only using trees he can go from one corner to another in a forest 



Doing udhyian bandha between a water fall 





Sitting calmly on tree branch so high that anybody will get vertigo! 


Only by divine direction such yogis come to earth. It is very difficult to know such personalities. I got entangled here in his photo albums which you can very well see for yourself. My job is to tell about Mahayogi ji. I know only one thing that Mahayogi ji is invaluable, we can get some idea about it by realizing that he has knowledge of many scriptures, he has learned Veda, Vedanta orally from masters, knows many forms of astrology, and not just theoretical knowledge from scriptures but practical experience too. His childhood was very mysterious, if given chance, I can write a whole book on it. Until now no disciple has reached top of himalaya with him. It is said about his siddhis that goddesses of Lamba lambhari hills near Banjar has given him capability to see past, present and future. Shikari devi (Shakambari mata) has given him power of maya. Mother Goddess of Joginigandha hill has directed him to hide his powers and live like a normal person. Since then Mahayogi ji has been living a life veiled with his maya. He is also known as the person who would bring Satya Yuga! Mata Hiddimba who is the mother goddess of Rakshasha (demons) advised him never to show his rare knowledge completely to anyone except in front of qualified disciples and true followers of Dharma. This is the reason a lot of people approached him to know him but rarely did anybody penetrate the veil of maya with which he has surrounded himself. He keeps the disciples occupied in on peripheral stuff until he can fully trust the person. If he doesn't find them capable, he leaves them. Nobody knows the reason behind his such behaviors. Usually you will find saints and sadhus wanting people to come to them, to have long queues of followers. But he doesn't let disciples stick long when he notices even slight carelessness. Only a rare and unique disciple can stick with a yogi. And it is not necessary to say that who sticks with him gets his grace and achieves stupendous feats in all realms of life. I couldn't tell you everything as I have been directed to stop this work today. If I had one more day, I would have told you guys a lot more, but before closing this I would like to share one thing with you all....



Image of mahayogi ji is very attractive and is embodiment of love.... 


How did a child became a tough yogi of himalaya? He was made leader of Kaulantak Peeth at young age of 21 because of his qualification of being fully adept and for being at the top of sadhana and knowledge. 

Although Mahayogi ji didn't want to leave Himalaya - even for public welfare, but wanted to server his guru all the time and to be with him. But one day, Mahaguruji called him and said, “Now that you are the head of Kaulantak Peeth, lord of whole Himalaya, what do you want to do now?”. Mahayogi ji replied that he would like to do something for his parents and want to live with his family, get married and serve guru. And that he wants to stay hidden from public glare. He asserted that he doesn't want anybody to know him. And said that when people do not even know him they talk all these negative, when he would go in public life who knows what all will be said about him by evil minded people. He added that if he goes in public, evil souls will not be able to tolerate that. Mahaguru ji then asked him how he knows there are evil souls in society? Mahayogi said it is his speculation by observing the world. But Mahaguru ji cut him short and said, it is the same society that bore me earlier. Now you took birth in the same society. Himalaya will send somebody else in future. Society is not evil just ignorant. Which is controlled and directed by wrong hands in every realm of society. And asked rhetorically if he won't go and try to correct the mistakes then what is the benefit of him being here? Mahayogi ji said, he doesn't know anything, and that this is his decision that e has told Mahaguru ji that he is not going in society. Mahaguruji tried to convince him in many different ways but to no avail. Then Mahaguru ji said, “Now your education is complete, diksha is complete, where is my guru dakshina?” Mahayogi ji stood with folded hands in front of mahaguru ji and said that, “I don't have anything....”.




Mahayogi ji was not ready to go in society at at any cost 



He continued, “whatever I have acquired, I have got it from you. What can I give you.”. Mahaguru ji said, “it is a rule so you must give me.”. At the end, mahayogi ji had to agree. Mahaguru ji said, “Take the message of Himalaya in the world. The world has forgotten this Kaulantak Peeth, make the world remember its forgotten glory. When you think that the work is done, then you can come back but don't come back before 15 years. This is my guru dakshina.”. After touching his holy feet, Mahayogi ji returned back home. Took his stuff and borrowed 300 rupees from friend and started on his mission of Kaulantak Peeth. Here I can only say that Mahayogi ji is divine, it is said there is one unfinished task from his last life that needs to be done too. We don't know what is that but it is also necessary to say here that Mahayogi ji doesn't know much about ways of the materialistic world, and sometimes get caught up in the quagmire of the worldly ways. Anybody can trick him by talk because of his sweet and simple nature. He laughs at himself also quite a lot but one thing really bothers us is to how to save him from evil minded people. There had been attempt to run him over with a truck in 2008, an attempt to poison him in 2008 too, threats of life in 2009, threatening phone calls, stone throwing at his vehicle- which was a close shave and he was saved by a thin margin of error.

Newspapers of Himachal published this news prominently, a case was also registered with the police. Now you only tell how can we protect him? Mahayogi ji is not worried at all, he is relaxed and is totally unaffected by all these incidents. And continuing his work diligently. Really, he is a true siddha yogi there is not even an iota of doubt!

But you must be getting these questions in your mind that what is the purpose and reason of these attacks on him. It is his attempt to stop the anti-social elements in society from spreading wrongdoings. You will be able to read more on further links on this website. This is only the start of this journey, it remains to be seen what lies ahead. It is the good fortune of people who stay with him and realize that they are having a chance to stay with a Mahapurush! Many other do come in contact with him but the veil of maya given by mother goddess Bhramari mata keeps them at bay....



Darshan of the holy lotus feet of Revered Mahayogi Satyendra Nath Ji... 



But Mahayogi ji can't hide from devotees of Shiv and Shakti! They break through his maya and are able to know about his divinity. Since he became Lord of Kaulantak Peeth, Kaulantak Peeth has come out of the deep veil of mystery. Today the world knows about Kaulantak Peeth only because of him. That day is not far away when Kullu of Himachal will become attraction point of millions. Even today the message is reaching to people from different corners of the world. The flag sanatana dharma of Bharat is again waving in the air along with Himachals' flag. This must be the brief introducton of Mahayogi ji. I request you all to forgive me if I have made any mistake in this. It is not easy to write stories and incidents about such divine yogi of Himalaya but I have tried. I thank Kaulantak Team too that they considered me capable enough to write few words on Mahayogi Ji.




Om namaha shivaya ||




-Yogi Lakhan Nath