साधना शिविर-दीक्षा-शिविर-नियमावली

posted Aug 19, 2012, 1:13 AM by Site Designer   [ updated Nov 19, 2012, 4:29 AM ]
'कृपया दीक्षा लेने वाले व शिविर में उपस्थित होने वाले साधक निम्न नियमों को भली प्रकार समझ लें'
१)'दीक्षा'  व्यापक अर्थों वाला शब्द है. किन्तु गुरु से जुड़ जाने कारण को प्रधानत: 'दीक्षा' कहते हैं. 'दीक्षा' कई प्रकार की होती है. 'दीक्षा' का सूक्ष्म अर्थ ये भी होता है की यदि गुरु तपस्वी हो और चौंसठ कला सम्पूर्ण हो तो उसकी तपस्या का अंश शिष्य को भी मिल जाता है. किन्तु 'दीक्षा' प्रबल भाव होने पर ही संपन्न होती है. कहा जाता है कि 'दीक्षा' और साधना, 'अमृत' जैसा पदार्थ है किन्तु दोनों पात्रों का ठीक होना जरूरी है अर्थात गुरु 'योग्य' हो और शिष्य भी 'योग्य' हो. दिव्य साधनाएँ व दीक्षाएं चरम पर ही फलीभूत होती हैं. 'दीक्षा'  ही धर्म के आगे बढ़ने का आधार है. 'दीक्षा' साधारण से ले कर 'ब्रहमपात' से भी ऊपर तक जाती हैं. ये तो आपके और गुरु के सामर्थ्य पर निर्भर करता है कि आप कहाँ तक की अनुभूति पाते हैं. सबसे बड़ी और अतार्किक सी जान पड़ने वाली मान्यता है कि 'दीक्षा' किसी आम आदमी को साधारण से ले कर 'महामानव' तक बना सकती है. 'दीक्षा' से कोई ऐसा दुःख नहीं जो नष्ट न हो. पर नियम वही है कि इसके लिए पात्र और आध्यात्मिक बुद्धि का होना जरूरी है. साथ ही नियम विशेष कि 'कलिकाल' में सभी 'दीक्षा' के योग्य नहीं जैसा की प्राचीन काल में था. जब मनुष्य अहंकार से ऊपर.........दोषारोपण की निम्न वृत्ति से ऊपर.....भौतिक तार्किक बृत्ति से ऊपर जाए, तो ही ये संभव है. ऐसा होना 'कलिकाल' में संभव नहीं,  क्योंकि जहाँ सर्वत्र 'धर्म' को 'व्यापार' बना दिया गया है और 'कपटी कालनेमियों'  नें डेरा जमा रखा है. ऐसे में संदेह होगा ही...और वहीँ 'दीक्षा' फल नहीं दे पाएगी.....ये बड़ी ही 'धर्मसंकट' वाली स्थित है कि क्या किया जाए....तो केवल प्रारब्ध को आधार मान कर 'योग्य गुरु' और 'योग्य दीक्षा' की  कामना करनी चाहिए.......जगत बनाने वाले 'नियंता' को आपकी भी चिंता अवश्य होगी. भारतीय ऋषि परम्परा के अमूल्य ज्ञान से 'दीक्षा' जोड़ती है.....कितु हम आपसे प्रार्थना करते हैं कि बिना जाने....बिना कसौटी पर कसे 'दीक्षा' न लें या आपकी 'भावभूमि' यदि ऐसी नहीं है, तो भी ऐसे प्रपंचों से दूर रहना ही अच्छा होता है. "कौलान्तक पीठाधीश्वर" साधकों को बहुत सी 'दीक्षाएं' देते रहते हैं,  जिसका कारण है कि सौ में से सत्तर या अस्सी साधकों पर तो 'दीक्षा' फलेगी और उनका आध्यात्मिक  विकास होगा. आप यदि 'अध्यात्म' को जानते हों और 'देहानुगत गुरु' से नहीं बल्कि 'ज्ञान गुरु' से जुड़ने का मादा रखते हैं, तो आपको चाहिए कि 'धर्मानुसार गुरु दीक्षा' अवश्य प्राप्त कर जीवन को 'निगुरा' होने से बचाएं. ये जरूरी तो नहीं कि आप 'प्राचीन धर्म' और 'परम्पराओं' को माने ही. किन्तु यदि आप उनमें 'सार तत्व' पाते हैं, तो उनसे दूर रहना मूर्खता होगी. इसलिए समस्त बातें सोच कर तार्किक-अतार्किक दृष्टि से निर्णय कर लेने पर ही 'दीक्षाएं'  लें. 'कौलान्तक पीठ' आपको 'दीक्षा' लेने व 'साधनाएँ' करने के लिए किसी प्रकार का 'भय' नहीं दिखता, न ही आपको 'लालच' देता है व प्रेरित करता है. हम विश्वास करते हैं कि जो काँटों के मार्ग पर चलने वाला होगा, जिसकी परम आध्यात्मिक बृत्ति होगी व 'ईश्वर इच्छा' होगी वही 'दीक्षा' प्राप्त कर इस मार्ग को 'सिद्ध पंथानुसार' स्वीकारेगा.

२)'दीक्षा'  लेने का वास्तविक नियम तो ये है कि घर का गृहस्थी का त्याग का 'गुरु' की वर्षों सेवा करे. उनके लिए 'भिक्षा' मांग कर लाये और वही 'भिक्षा' 'गुरु' को अर्पित करे. 'गुरु' की 'चरण पादुका पूजन' करते हुए तेल आदि से गुरु की 'सेवा'  मालिश कर उनके 'वस्त्रों' को बिधि पूर्वक साफ कर 'गुरु' के 'भोजन विश्राम' आदि की व्यवस्था साधक करे. 'गुरु' को किसी भांति कष्ट न पहुंचाए. 'गुरु' को ही इष्ट व 'शिव' मानें.'गुरु' की व 'शिव' की 'निंदा' न सुनें न करें. करने वालों से 'सख्ती से निपटे' जिसके लिए 'गुरु' से 'युद्ध कौशल' आदि 'विद्याओं' को सीखे व समय पर 'दुष्टों' व 'धर्म का विरोध करने वालों' पर इसका प्रयोग करे.'ज्ञान से' 'तर्क से'  'विवेक बाहुबल से' 'धर्म विरोधियों' का सामना करें. योद्धा साधुओं का सम्मान करें. सिद्धों का आचरण करें.गुरु मार्गी 'ज्ञान मार्गी'  हों......आदि...अदि....अनेक बाते हैं, जिसे जान कर 'आम आदमी' तो भाग खड़ा होगा......इसलिए आज के समय में ये सब तो संभव नहीं है. क्योंकि परिवेश बदल गया है. लड़ने की जरूरत नहीं क्योंकि 'लोकतंत्र और क़ानून व्यवस्था' आपकी व आपके 'धर्माधिकारों' की रक्षा करती है. आज लोग अपने 'माता-पिता' के चरण पानी से नहीं धोते उनकी बृद्ध होने पर 'सेवा-मालिश' आदि नहीं करते, तो 'गुरुओं' की बात कोसों दूर हैं. यदि कोई करेगा भी तो अन्य 'बेतालादी' सहन नहीं कर पाएंगे.....ऐसे में क्या किया जाए? तो केवल इतना ही पर्याप्त है कि आप गुरु के प्रति श्रद्धा भाव रखें, सामर्थ्यानुसार 'दक्षिणा' आदि दे कर उनसे 'दीक्षा'  के लिए प्रार्थना करें.यदि आप धन हीन है तो 'गुरु के चरणों' में निवेदन करें. वो तो दुःख को जानने वाले है. आपको भी कृपावश अनुग्रहित अवश्य करेंगे. यदि आपमें पात्रता हो तो 'गुरु' आपकी स्थित,आयु,लिंग,वर्ण,जाती,रंग,देश काल,स्वास्थ्य,व्यवसाय आदि नहीं देखते, वो तो केवल आपको सीने से लगा लेते हैं.  धन्य हैं ऐसे साधक, जिनको 'गुरु' अपने सीने से लगा कर अपना स्नेह प्रदान करते हैं. आपको भी सरल नियमों का पालन करके ही 'दीक्षा' लेनी चाहिए व साधना मार्ग में आगे बढ़ाना चाहिए.हमें ख़ुशी होती है कि प्राचीन काल से ही जब विश्व कुछ भी नहीं जानता था तभी से 'गुरु-शिष्य' का सम्बन्ध आज 'घोर कलिकाल' तक चल रहा है. 'दीक्षा' लेने के अनेक 'शास्त्रीय व पंथानुसार' नियम हैं पर सामर्थ्यवान गुरु के लिए ये 'नियम' गौण ही होते हैं.

३)'दीक्षा'  की 'दक्षिणा' चढ़ावा आदि-जैसा कि पहले ही बताया जा चुका है कि इस युग में एक नहीं अनेकों 'कालनेमि' हैं जो 'हनुमान' जी को भी धोखा देने में कामयाव रहे....फिर आप और हम क्या है? हमारे धर्म और उसकी 'सनातन परम्पराओं' को नष्ट करने का 'दिन-रात' अविरल प्रयास सदियों से जारी है.अब तो नौबत यहाँ तक भी आ गयी है कि.'धर्म प्रमुखों' के शिष्यों के बीच प्रायोजित 'कालनेमियों' को भी भेजा जाने लगा है ताकि 'धर्म' का समूल नाश हो जाए और सनातन अपनी जड़ें खो जाए. इसलिए 'कालनेमियों' से सविनय प्रार्थना है कि न तो कोई 'दक्षिणा' दें न ही कोई चढ़ावा चढ़ाएं, न ही पीठ के किसी कारण से जुड़े......या हमारी मान्यता को मानें. हम किसी भी व्यक्ति, संगठन आदि के 'तर्क का प्रतिउत्तर' देने के लिए विवश नहीं हैं व सभी कानूनी समस्याओं हेतु केवल 'हिमाचल प्रदेश शिमला न्यायलय' ही मान्य होगा. दक्षिणा धन व्यवस्था व  घोषणाएं  'कौलान्तक पीठ' करती है न कि 'कौलान्तक पीठाधीश्वर महायोगी सत्येन्द्र नाथ जी महाराज'. ऐसे में कोई भी 'विवाद' होने पर उसका उत्तर केवल पीठ के 'प्रतिनिधि' ही देंगे व कानूनी समस्याओं का निपटारा भी 'अधिकृत व्यक्ति' ही करेगा. तत संबंधी सभी विवादों के लिए भी वही 'अधिकृत व्यक्ति' ही उत्तरदायी होगा. सबसे बड़ी प्रार्थना कि भले ही हमें हमारी 'पीठ' को धर्म प्रसार  के काम काज व विराट कार्यों के लिए बड़े  धन कोष की आवश्यकता है. पर आप न ही दें तो अच्छा होगा. 'दीक्षा'  निशुल्क नहीं दी जायेगी क्योंकि ये हमारे व 'महायोगी जी' के समय का 'दोहन' करती है व 'व्यवस्थाएं' करनी सरल नहीं होती. 'पीठ' के नियम 'महायोगी जी' पर लागू नहीं होते. वे यदि अपनी कृपा से किसी को भी 'निशुल्क दीक्षा' देते हैं तो हम उस स्थित में 'मौन' हैं. हमारा प्रयास 'धन संग्रह' का भी रहता है क्योंकि हमारा उद्देश्य 'कौलान्तक पीठाधीश्वर' के ज्ञान को संजोना, संस्कृति के लिए काम करना व उसका प्रसार है. साथ ही हम नहीं चाहते कि 'महायोगी जी' जिनको हम प्राणों से भी अधिक चाहते हैं वो संसार में 'अव्यवस्था' में फसे रहे. हालांकि उनके लिए अव्यवस्था कुछ भी नहीं होती वो काँटों पर सोने वाले, बर्फ पर चले वाले, आग्नि के निकट रहने वाले हैं, भिक्षा वृत्ति जिनका स्वभाव है ऐसे पुरुष के लिए भला हम क्या चिंता करेंगे? किन्तु कर्म कहता है कि 'गुरु सेवा'  ही आधार है. इसलिए 'धन' का हम प्रयोग करते हैं और योग्य साधकों से अनुरोध कर 'योग्य धन' द्वारा 'गुरु' की व 'धर्म' की अपने विवेकानुसार 'सेवा' करते हैं. 'दीक्षा-दक्षिणा' आदि के धन का हम क्या करते हैं ये हमारा या 'पीठ' का निजी मामला होता है, इसके बारे में हम किसी को कुछ नहीं बताते. जो की पूर्णतया 'संदेह जनक' है इसलिए 'धन' आदि सोच-समझ कर ही दें या न दें.

४)'कौलान्तक पीठ' का प्रमुख उद्देश्य 'सनातन' का विकास है, परम्पराओं का संरक्षण व संवर्धन है. हम 'हिन्दू धर्म' का प्रचार व प्रसार करते हैं. व विश्वास करते है कि 'महायोगी जी' एक 'अलौकिक' 'अवतारी' पुरुष हैं जो कि हमारा विश्वास है. उनकी 'अलौकिकता'  के लिए हम किसी 'चमत्कार' को समर्थन नहीं देते व न ही आपको कहते हैं कि वो 'चमत्कारिक' हैं. हम 'शिष्य' हैं 'शिष्य' के लिए 'गुरु'  'भगवान् स्वरूप' होते हैं, इसलिए हम सदा उनकी बडाई करते हैं. हालाँकि 'कौलान्तक पीठाधीश्वर महायोगी सत्येन्द्र नाथ जी महाराज' कहते हैं कि उनमें अभी बहुत सी कमिया हैं, वो एक आम आदमी से बढ कर और कुछ भी नहीं हैं. किन्तु 'पीठ' विश्वास करती है कि वो एक 'महामानव' हैं, उनका जन्म  'प्रायोजित' है, वो 'सिद्धों की भविष्यवाणी' के अनुसार पैदा हुए हैं. वो दुखों, आलोचनाओं, अपमान  को सहने व मानव को मार्ग बताने के लिए जन्में हैं.उनके 'दिव्य गुरुओं' नें उनको 'विश्व के दुःख' हरने के लिए तैयार किया व भेजा है. वो 'परम मायावी व सिद्ध' है. उनकी कमियां हमें नजर नहीं आती और न ही हम देखना व जानना चाहते हैं, क्योंकि वो 'देहानुगत' है. हम उनको 'तात्विक' रूप से पूजते हैं. उनसे 'बैर' रखने वाले व उनके विरुद्ध 'षडयंत्र' रचने वाले हमें रोज कोई न कोई झूठा तथ्य या विचार भेजते हैं. हम उनके 'आभारी' हैं कि वे अपनी जिंदगी का इतना समय 'महायोगी' जी के विरूद्ध सोचने में इस्तेमाल करते हैं. किन्तु इन सबसे 'हममे' और हमारी 'मान्यताओं' में अंतर नहीं आएगा. क्योंकि केवल हम ही उनको सबसे निकट से और सटीक तरीके से जानते हैं. हमारे लिए वो एक ऐसे 'पुरुष' हैं जिहें हम हर रूप में केवल 'प्रेम' करना चाहते हैं. इसलिए हम 'अतिश्योक्ति'  पूर्वक उनकी 'बडाई' करते हैं. आपको चाहिए कि 'बुद्धि' और 'विवेक' का साथ ले कर ही तथ्यों पर चलें. हमारी मान्यता 'अवैज्ञानिक'  हो सकती हैं और बहुत सी जगह है भी, पर हम फिर भी 'विचार' पर 'दृड़' हैं. इसलिए आप केवल उतना लीजिये जो आपके 'योग्य' हो. 'महायोगी जी' तो 'अथाह समुद्र'  है. किन्तु उनकी बडाई यही है कि उनसे सरल कोई दूसरा नहीं मिल सकता. आप उनको  'गुरु' या 'इष्ट' के रूप में मान सकते हैं किन्तु उसके लिए 'तात्विक बुद्धि'  रखें. विश्वास से 'महायोगी' शीर्ष पर पहुंचे हैं आपका विश्वास ही आपको भी आगे ले जाता है.यदि आप इन सब बातों को जानने के बाद भी 'पीठ' से जुड़ना चाहते हैं और 'महायोगी जी' के पथ का अनुसरण करना चाहते हैं तो ये 'अद्भुत' ही होगा. ऐसे में 'हम' और 'कौलान्तक पीठ' आपका हार्दिक स्वागत हैं.

 ५)'शिविर' में आने वालों के लिए 'लाल रंग' का वस्त्र कुर्ता आदि अनिवार्य होगा. गले में 'रक्त चन्दन' की 'माला' व मंत्र साधना के लिए छोटे दानों वाली 'रुद्राक्ष माला' आदि हो. अग्रिम निवेदन पर ये सभी वस्तुएं आपको 'मूल्यानुसार' 'पीठ के सदस्य' भी उपलब्ध करवा सकते हैं. आवश्यक बातों को लिपिबद्ध करने के लिए 'डायरी-पेन' आदि साथ रखें. शिविर के दौरान 'निजी फोटोग्राफी' और 'विदिओग्राफी' पूर्णतया वर्जित होगी. 'मोबाइल' जैसे आधुनिक 'कर्णपिशाचिनी यन्त्र' आदि  'मूक' अवस्था में रखें. रहने की व्यवस्था के लिए 'पीठ के सदस्यों' से संपर्क किया जा सकता है. 'वायुयान' से आने वाले हिमाचल के भुंतर यानि कुल्लु-मनाली 'एयरपोर्ट' को चुन सकते हैं. 'दिल्ली' से 'कुल्लू ' आनेवाली 'बस' द्वारा 'औट' नामक कस्वे तक पहुंचा जा सकता है. आपको मूलतय "बालीचौकी" नामक कस्वे तक पहुँचना है। 'औट' के लिए 'चंडीगढ़' से भी लगातार बस सेवाएँ उपलब्ध हैं. रेल द्वारा 'चंडीगढ़' पहुँच कर कृपया 'सड़क मार्ग' का प्रयोग करें. 'निजी वाहनों' में आने वाले कृपया वाहनों को धीरे और सावधानी पूरवक चलायें.  शिविर स्थल 'बालीचौकी' से काफी दूर है और गोपनीय स्थल पर है। अत: 15 तरीक की दोपहर तक आपको पहुँचाना ही होगा। वापसी 22 दिसंबर सुबह की है अत: वापिसी की बुकिंग 22 दिसंबर शाम की ही चुनें। आपकी सहायता के लिय 'कौलान्तक पीठ टीम' उपलब्ध रहेगी. 

६)''वैश्विक भैरव साधना दीक्षा' की दक्षिणा 10000/-रुपये देने पर ही दीक्षा प्रदान की जायेगी. आप दीक्षा राशी अग्रिम जमा करवा कर अपना पंजीकरण क्रमांक प्राप्त कर सकते हैं. हम आपसे एक बार फिर अनुरोद्ध करते हैं की केवल साधना जगत की गहरी पकड़ और विश्वास रखने वाले साधक-साधिकाएँ ही भाग लें. ये कोई जन-सामन्य हेतु आयोजित सत्संग शिविर नहीं है. आप दीक्षा हेतु आन लाइन अकाउंट का प्रयोग कर सकते हैं पीठ द्वारा अधिकृत अकाउंट की डीटेल स्वामी कृष्णानंद जी से प्राप्त करें- 
 स्वामी कृष्णानंद जी से पंजीकरण क्रमांक प्राप्त कर लें
Contact No-Swami Krishnanand-08054310441
  (कौलान्तक पीठ हिमालय साधकों को कौलान्तक पीठाधीश्वर महायोगी जी के पावन सान्निध्य का लाभ उठाने का अवसर प्रदान कर रहा है..आइये रहस्य पीठ के योगियों की निकटता को अनुभव कर जीवन को गौरवान्वित करें-'वैश्विक भैरव साधना शिविर', हिमालय, 16 दिसंबर से 21 दिसंबर 2012)