ज्योतिष और महायोगी

posted Jun 12, 2011, 12:09 AM by Site Designer   [ updated Jun 14, 2011, 5:55 PM ]
                                                                        कालयोगी
कौलान्तक पीठाधीश्वर जिन्होंने अपने जीवन में 24 वर्ष की आयु तक चार बार समय चक्र पूजन किया है और काल के रहस्यों को समझा है, तीनों काल और उसकी कलाओं सहित मूल को समझा है, समय और समयातीत को समझा, योग से दिव्य चक्षु ले कर ब्रहमांड के रहस्य सार को समझा, समाधी से उत्तम भविष्य में जाने का कोई दूसरा उपाय नहीं है, किन्तु साधारण जीवन को प्रकाशित करने के लिए ज्योतिष सबसे सरल और बेहतर रास्ता है, वेदों के चक्षु के रूप में सनातन धर्म में ज्योतिष को स्थान प्राप्त है, किन्तु ज्योतिष का अर्थ केवल ग्रह गणना ही नहीं होता, योग की भान्ति ही ज्योतिष भी अनेक विधाओं का संगम स्थल है, वैसे तो ज्योतिष की बहुधा विधाएं हैं, किन्तु छ: प्रकार के ज्योतिष को प्रमुख मन गया है, जिनके भीतर ही एनी विधाएं समा जाती है, ये छ: प्रकार हैं 1) नीरियन ज्योतिष 2) सायन ज्योतिष 3) सामुद्रिक शास्त्र 4) तंत्र ज्योतिष 5) दिव्य दृष्टि 6) काल ज्ञान नीरियन ज्योतिष को चन्द्र सिद्धांत कहा जाता है जिसमें चन्द्रमा, नक्षत्र व ग्रह का राशियों पर क्रमश: प्रभाव व आंकलन किया जाता है,  फिर सायन ज्योतिष आता है जिसे सूर्य सिद्धांत कहा जाता है, जिसमें सीधे राशियों और सूर्य की गति को सबसे प्रमुखता दी गयी है व ग्रहों का तदन्तर प्रभाव बताया जाता है, यहाँ विशेष बात जो महायोगी जी सीखते है वो ये है कि " सूर्य सिद्धांत ग्रहों को स्थूल पिंड मानता है, इस लिए सौर मंडल के बाहर इसका अस्तित्व समाप्त हो जाता है, चन्द्र सिद्धांत ग्रहों को स्थूल न मान कर देवयोनि प्राप्त महाशक्ति या देवता मानता है, जो ब्रह्माण्ड के सभी कोनों में उपस्थित हैं, इस लिए ये ज्योतिष सौर मंडल और इस आकाश गंगा से बाहर भी कारगर है," महायोगी जी नीरियन के एक-एक अंग की विस्तृत व्याख्या देते है, नीरियन में नक्षत्र, लग्न, बार, तिथि, योग, स्थान, मुहूर्त आदि से भी भविष्य कथन की अनेकों प्रणालियाँ है, समय स्थान नाम कुल का पता न होने पर भी प्राण कुंडली या भक्ति ज्योतिष अर्थात राम शलाका, हनुमान ज्योतिष आदि से भविष्य कथन का सिद्धांत उपलब्ध है, जिससे नीरियन की महता बहुत बढ़ी है, सायन ने भी कई अंगों को अपने में संजोया है, वैश्विक भविष्यवाणियों, मौसम व ऋतू आदि की भविष्यवाणियों में सायन का कोई मुकाबला नहीं है, इनके अतिरिक्त ज्योतिष का जो महासागर है उसे सामुद्रिक शास्त्र कहा जाता है, शुरू के दिनों में तो मैं भी यही समझाता था कि सामुद्रिक शास्त्र कोई ग्रन्थ ही होता होगा,एक दिन जब कौलान्तक पीठाधीश्वर महायोगी सत्येन्द्र नाथ जी से प्रश्न करने का मौका मिला, तो मैंने सहज ही सामुद्रिक शास्त्र के बारे में पूछा, तो महायोगी जी ने जो कुछ बताया हैरान कर देने वाला ही था, "सामुद्रिक शास्त्र ज्योतिष का सबसे प्रयोगात्मक पक्ष है, बहुत ही स्थूल, जैसे हस्त रेखा, मस्तिष्क रेखा, पाँव की रेखाएं, शरीर का आकृति विज्ञान, तिल से ले कर बनावट तक, बात-चीत की शैली से ले कर वस्त्र पहनने, खाने-पीने की आदतों का आंकलन कर,          (वास्तु, अंक, वर्ण यानि रंग आदि का ज्ञान कर)

 किसी के बारे में सहज ही जान लेना, ब्रिक्षों हवाओं पर्वतों, पक्षियों, पशुओं, चीटियों या कीड़े मकोड़ों के व्यवहार से परिस्थिति को जान लेना आदि उल्लू , कौवा, गीदड़, गिद्ध, तोता आदि से भविष्य जान लेना व परिस्थिति का ज्ञान पा लेना सब सामुद्रिक शास्त्र के अंतर्गत आता है, छिपकली, गिरगिट सभी इस क्रम में आते हैं, काक भाषा जैसी विद्या भी इसका ही एक अंग है," तो आप समझ सकते हैं कि इसके अतिरिक्त भी कई एनी विधाएं इसमें निहित है, जैसा कि एक बार महायोगी जी नें बताया कि लाल किताब नाम का कोई ज्योतिषीय ग्रन्थ होता ही नहीं है, प्राचीन समय में भगवान सूर्य के सारथि अरुण नें सूर्य देवता से जो सामुद्रिक शास्त्र का ज्ञान प्राप्त किया था, उसे एक ग्रन्थ के रूप में संजो लिया था, जिसकी भविष्यवानियाँ लाभदायक होने के कारण उसका फारसी उर्दू आदि में अनुवाद कर दिया गया, लेकिन इससे उसकी प्रमाणिकता कम हुई,अतः ये ग्रन्थ भी सामुद्रिक शास्त्र का ही एक भाग है, अब बात करते हैं तंत्र ज्योतिष की, महायोगी जी तंत्र ज्योतिष के सम्बन्ध में बताते हुए कहते हैं कि "मंत्र विद्या, स्वप्न दर्शन,अंग स्फुरण, दिशा शूल, बार के अनुसार कार्य का सिद्धांत, वास्तु शास्त्र-जो कूर्म विद्या का एक हिस्सा है, वस्त्र, चित्र, छवि, मिटटी, काले सरसों, केश आदि का विश्लेष्ण कर भविष्य जानने की विधि तंत्र ज्योतिष कहलाती है, इसका सबसे मजबूत पक्ष काला जादू द्वारा भविष्य कथन है, यानि कि हिप्नोटिक ड्रीम में किसी को लिटा कर उससे भविष्य और बर्तमान की बात जान लेना," इसके अतिरिक्त भी कई अन्य तत्व है, जैसे प्राचीन पांडुलिपियों का सबसे पुराना पंचांग, जो टंकारी नाम की भाषा में बना है, इसे रहस्य बना कर किताबों में लिखा गया था, लेकिन कौलान्तक पीठाधीश्वर महायोगी सत्येन्द्र नाथ जी महाराज नें इसको पूरणतय: निर्मित कर, तंत्र ज्योतिष के साधकों पर सबसे बड़ा उपकार किया है, आइये सबसे पहले आपको दिखाते हैं हिमालय का सबसे रहस्यमयी "काल का कलेंडर" जो तंत्र ज्योतिष का मूल है, इसी पंचांग में तंत्र ज्योतिष
के महारहस्य छिपे हुए हैं, इसे भविष्य कथन का सटीक 
माध्यम कहा जाता है, अब बात करते हैं दिव्य दृष्टि की, जब साधक परम प्रज्ञावान हो जाता है, महासमाधि का अनुभव कर लेता है तो उसके भीतर दिव्य चक्षु का उदय होता है, जिसे दिव्य दृष्टि कहा जाता है, इस दृष्टि को प्राप्त कर भविष्य को सटीकता से देखा जा सकता है, महायोगी जी कहते हैं कि "समाधी की परम स्थिति में ऐसी दृष्टि का अनुभव होता है, किन्तु इसका ज्यादा लाभ आम जन-मानस को नहीं मिल पाता, क्योंकि दिव्यदृष्टि प्राप्त होते ही साधक मौन हो जाता है, सब कुछ जानते हुए भी खेल समझ कर उसमें हस्तक्षेप नहीं करता और यदि चाहे भी तो नहीं कर पाता, ये बहुत ही ऊँची स्थित है," इसे पा लेना बहुत बड़ी उपलब्धि माना गया है, किन्तु इसे पाना बहुत ज्यादा कठिन भी नहीं है" हमने महायोगी जी को समाधि की अवस्था में देखा है वो दिव्य दृष्टि के अनुभवों को सहजता से बताते हैं, पुराणों व महाभारत सहित कई ग्रंथों में ऋषि-मुनियों का विवरण है, कि उनके पास ये दृष्टि थी, वो बिना ग्रह गणना या नक्षत्र, लग्न विचारे भी भविष्य को देखने में सक्षम थे, ये उच्चस्तरीय साधनात्मक भूमि की घटना है, लेकिन इससे भी ऊपर एक और विधा है जिसे कहा जाता है काल ज्ञान, दिव्य दृष्टि भी तीन कालों तक ही सीमित है, वो भी काल रहित को नहीं जान सकती, किन्तु काल ज्ञानी समय की उत्पत्ति, विविध गति, भूत काल, वर्तमान सहित भविष्य को जानता है व समय के अंत को भी जानता है, लेकिन इस पद तक पहुँच कर कोई साधना कर ले ऐसा काल ज्ञानी महायोगी जी के सिवा और कौन उपलब्ध हो सकता है, अब ज्यादा नहीं कहना चाहता, आप इन सब बातों से अनुमान लगा सकते हैं कि ऐसा ज्योतिरविज्ञानी, क्या कोई साधारण पुरुष होगा, यही कारण है कि केवल 12 साल की छोटी सी आयु में ही महायोगी सत्येन्द्र नाथ जी को गुरु पदवी प्रदान कर दी गई, और महायोगी को ग्रहराज की उपाधि से महागुरुओं नें अलंकृत किया, तो ऐसे में राहू, केतु , मंगल, शनि या कालसर्प दोष आदि की क्या विसात, महायोगी अनेकों मन्त्रों के ज्ञाता व मंत्र पुरुष एक हैं, गणित आदि सहित फलादेश के उत्तम विद्वान् हैं, एक प्रखर ज्योतिषी के रूप में महायोगी जी का देश भर में ही नहीं बल्कि विश्व भर में अपना एक प्रमुख स्थान, ज्योतिष के आकाश के चमकते सूर्य है महायोगी सत्येन्द्र नाथ जी महाराज, महायोगी जी नें पहली बार बताया कि ग्रह केवल स्थूल पिंड नहीं अमृत पिए हुए देवता हैं, जिनके प्रतिनिधि पिंडों को हम आकाश में विचरते देखते हैं, ज्योतिष का ऐसा दिव्य ज्ञान रखने वाले योगी के बारे में कुछ लिखते हुए भी मन घबराता है, पर हमारा सौभाग्य है कि हम ये कार्य करने का प्रयास कर रहे हैं, "ज्योतिष कुलभूषण महायोगी जी" को नमन, यहाँ एक प्रसंग ये भी बताना चाहूँगा, 
कि महायोगी जी जब स्कूल में पढ़ा करते थे, तो लोग बहुत बड़ी संख्या में उनके पास समस्या समाधान के लिए आया करते थे, लेकिन महायोगी जी कभी स्कूल तो कभी साधनों के लिए हिमालय चले जाते थे जिस कारण लोग उनसे मिल ही नहीं पाते थे, ऐसे में लोगों नें एक नया काम शुरू किया, वो ये कि दो 
सफेद कागजों पर अपने हाथों का स्वही से छापा बना देते, नाम और जन तारीख तथा स्थान लिख देते, जब भी महायोगी जी को समय मिलता उनका अध्ययन कर कागज़ पर ही फलादेश लिख दिया करते थे, उनके घर स्थित साधना कक्ष से हमें कई फाइल्स बरी मिली, जिनमें कई लोगों के हाथों के निशान बने थे, महायोगी जी 
द्वारा लिखित एक छोटी सी पुस्तिका भी मिली, जिसमें उनहोंने बारीकी से हस्तरेखाओं के बारे में जानकारियां दी हुई थीं, कुंडलियों का ढेर तो अभी भी उनके पास लगा रहता है, उनके ज्योतिष ज्ञान का लाभ बहुत से लोग उठा चुके हैं,आज देश के बड़े टीवी चैनल्स व समाचार पत्र भी महायोगी के ज्योतिष कार्यक्रम दिखा रहे हैं, सबसे बड़ी बात तो ये 
है कि उनके कामों में कोई दिखावा,आडम्बर, या नाटक नहीं होता जैसा कि आजकल कुछ मनघडंत ज्योतिषियों ने ज्योतिष का तमाशा बना कर रख दिया है..................