हिमालय और कौलान्तक पीठ

posted May 30, 2011, 8:30 AM by Site Designer   [ updated Nov 19, 2012, 3:58 AM ]
हिमालय केवल पर्वत नहीं है साक्षात देवता हैं, जिनके दर्शन मात्र से आत्मा तृप्त हो जाती है, सुदूर तक फैले हिमशिखर यूं तो वीरान नजर आते हैं पर इनकी गहराइयों और ऊँचाइयों पर रहता है एक अद्भुत योगी जीवन, भारत का आध्यात्म हिमालय में ही बसता है, ज्ञान की पावन धरा जिस पर करोड़ों देवात्माएँ निरंतर विचरण करती रहती है, कम्कम्पा देने वाली शीतल सुगन्धित वायु जहाँ निरंतर बहती रहती है, एक ऐसी पावनी धरा जो तपस्वियों का महादुर्ग है, आधी नायक शिव और नायिका शक्ति का जहाँ एक छत्र साम्राज्य है वो पवित्र हिमालय ऋषि मुनियों का परम आश्रय है, हिमालय पर एक से एक महा शिखर हैं जो बढाती आयु को, चलते समय को मनो थाम ही लेते हैं, जहाँ रहने पर समय पृथ्वी के समय से अलग ही चलता प्रतीत होता है, निम्न हिमालय के देवदार भरे बृक्ष, मद्धम हिमालय की लघु बनस्पतियां और दिव्य औषधियां व महाहिमालय का निर्जन क्षेत्र सब एक रहस्यमय संसार को समाते हुए है, इसीलिए महारिशी काकभुशुण्डी जी महाराज नें इस क्षेत्र का नाम रख दिया 'महारहस्य पीठ', एक और जहाँ सभ्यता में धर्म के द्वारा मानव जीवन को आदर्श व सुगम बनाने में कई दिव्य आत्माएं जुटी हुयी हैं दूसरी और उन्ही दिव्य आत्माओं का पवित्री करण एवं शोधन हिमालय में होता है, ताकि कोई योग्य आध्यात्मिक महायोद्धा इस सृष्टि के मकडी सामान मायाजाल में जा कर जन-जन को धर्म व जीवन की सच्ची दिशा दिखा सके, हिमालय पिता की तरह भारत ही नहीं वरन विश्व का पालन कर रहा है, हिमालय अपने आप में दिव्यौघ गुरु हैं, यदि दिग्दिगंत से चली आ रही कोई तेजस्वी आत्मा गुरु निर्देश में हिमालय के बृक्षों अथवा कन्दरा की शरण ले ले तो सड़ते हुए शरीर में दिवता की सूक्ष्म झनझनाहट होने लगाती है, बुद्धि प्रधान जीव से अलग यदि ह्रदय प्रधान जीव हिमालय के दर्शन भी कर ले तो धर्म की शिक्षा देने की आवश्यकता नहीं रहती, हिमालय की शीतलता जहाँ इन्द्रियों को संयमित व स्वस्थ कर देती है वही मन और बुद्धि को भी निर्मल कर देती है, हिमालय शक्ति का प्रतीक है लेकिन क्षमा अहिंसा दया और प्रेम का देवता भी है, इस हिमालय का महाविस्तार है मूलत: तो इसकी भौतिक संरचना रूस से शुरू हो कर मायामार में समाप्त होती है, किन्तु इस हिमालय के सबसे रहस्यमयी और दिव्य क्षेत्र को कौलान्तक पीठ या सिद्धाश्रम या महाहिमालय या नीलखंड अथवा उत्तराखंड कहा जाता है, ग्यानगंज रुपी इस महा भूमि को आप दिए गए मानचित्र में देख सकते हैं, मूलतया हिमालय का पर्यायवाची नाम ही है कौलान्तक पीठ, जिसे सिद्धों, नाथों, योगिओं तथा तपस्वियों की भूमि कहा जाता है, यही कारण है की आम जन मानस इसे तपोभूमि कहता है, किन्तु आज ये हिमालय का प्रमुख भाग भी यानि कौलान्तक पीठ भी टुकड़ों में बट गया है, इसका बड़ा हिस्सा तिब्बत से जुड़ा हुया था जो कभी कौलान्तक पीठ का ही भाग था, किन्तु बाद में वहां पद्मसंभव के कारण बौद्ध धर्म पनपा व चीन नें इस पर कब्ज़ा कर लिया, मानसरोवर व कैलाश पर्वत का पिछला पठार कौलान्तक पीठ की सीमा में ही आता है, जिसपर अतिवादी चीन नें बल पूरवक कब्ज़ा कर रखा है, बड़े ही दुःख की बात तो ये भी है की नाथों की प्रमुख स्थली व शिव की तंत्रमई धरा नेपाल व भूटान भी इसी पीठ के हिस्से थे, बंगलादेश व मनमार बर्मा तक ये एक ही क्षेत्र था उधर पश्चिम में पकिस्तान का बड़ा इलाका व अफगानिस्तान का कुछ शुष्क पर्वतीय क्षेत्र भी कौलान्तक पीठ ही था, लेकिन हजारों साल के आक्रमण, कथित महान पृथकतावादी मनुशोयं की बिरादरियों नें पहले तो सीमायें बना दी और बाद में देश, लेकिन कौलान्तक पीठ को भले ही टुकड़ों में तोड़ दिया गया हो लेकिन आज भी सूक्ष्म स्थूल व आध्यात्मिक रूप से ये धरा एक ही है, ये सारा क्षेत्र आर्यावर्त का था भारत बर्ष का जो जो उसे ही मिलना चाहिए, लेकिन मिलना तो दूर सीमायों के मजबूत होते ही कौलान्तक पीठ यानि हिमालय का अध्यात्मिक जीवन बहुत प्रभावित हुआ, क्योंकि ये सब सभ्यता से दूर हुआ इसलिए किसी को इस बात का ज्यादा प्रभाव व दुःख नहीं हुया किन्तु इन पर्वतों पर रहने वाली शेष आध्यात्मिक चेतनाएं आज भी ये सब देख कर दुखी है, इस विशाल भूखंड पर धर्म अध्यात्म के इतने रूप स्थित हैं कि कोई एक जन्म या दस बीस जन्मों में भी जान ही नहीं सकता, 18 करोड़ देवताओं का एक ही आश्रय स्थल होने से इसकी महामहिमा हुयी है, इस बीरन दिखने वाले स्थल पर संगीत मूलाधार पनपा, शत्रुओं से लड़ने व आत्मरक्षा के लिए युद्ध विद्या फली फूली, योग का प्रयोगात्म अध्यात्म निखरा, वैदिक कर्मकांड ने तंत्र के साथ साथ अंगड़ाईयां लीं, इसी स्थल नें ऋषियों की 64 कलाओं को समेटे रखा, इस बीच भारत वर्ष नें अंग्रेजों व मुगलों सहित कई आक्रमणकारियों का सामना किया, इस लम्बी जद्दो जहद में कौलान्तक पीठ की महाहिमालय की सबसे प्राचीन सिद्ध महापरमपरा कमजोर होती चली गयी, देवी पार्वती की जन्म स्थली जो मन्त्रों व रहस्यों से गूंजती थी अब बर्फ की चादर से ढकी उदास सी नजर आती है, जिस स्थली नें ऋषियों का अद्भुत विज्ञान देखा, जहाँ रह कर विद्यार्थियों नें ब्रह्मांड व मानव जीवन के रहस्यों को सुलझाया, जहा चिकित्सा से ले कर लेखन, नीति, समाज शास्त्र की रचना हुयी, वही कौलान्तक पीठ आज अपना ही अस्तित्व खोज रहा है, आज का युग बिलकुल अलग हो गया है किन्तु ऐसे समय में भी इस हिमालय के योगी वैसे ही हैं जैसे वो कई हजारों साल पहले हुया करते थे, आज यदि कोई पूछ ही ले कि ये कौलान्तक पीठ कहाँ है तो हम क्या उत्तर दें कि कही नहीं? क्योंकि सब तो एक घर या मंदिर या आश्रम देखना चाहते हैं जो कि कौलान्तक पीठ हो ही नहीं सकता, कौलान्तक पीठ या हिमालय तो विस्तार है जिस पत्थर पर या नदी पर या जमीन पर हिमालय में आप खड़े होंगे वही कौलान्तक पीठ है, वैसे तो अपने आप में किसी अध्यात्मिक राष्ट्र से कम नहीं है कौलान्तक पीठ किन्तु कलियुग के कारण इस पीठ का लगभग लोप होने ही वाला है, इस पीठ को आखिरी बार सिद्धों व नाथों नें संभाला था, किन्तु आज स्वयं नाथ पंथ और सिद्ध पंथ आखिरी साँसे ले रहा है, उनके पास थोडा सा शाबर मन्त्र का ज्ञान बचा है और बातों के अतिरिक्त कुछ भी नहीं बचा है, नाथ पंथ तो सन्यासियों के करण आगे बाधा लेकिन हिमालय का सिद्ध पंथ अब अंतिम अवस्था में आ चूका है आज पूरे भारत वर्ष में "प्रातः स्मरणीय योग कुल नायक पुज्पाद श्री सिद्ध सिद्धांत नाथ जी महाराज" के केवल चार ही शिष्य आख़िरी सिद्ध परमपरा के वारिस है, जिनमें सबसे छोटे हैं "कौलान्तक पीठाधीश्वर महायोगी सत्येन्द्र नाथ", जिनको हिमालय पुत्र भी कहा जाता है, जिन पर अब इस हिमालय की सिद्ध परम्परा की आख़िरी उम्मीद टिकी है, यदि हिमालय के गौरवशाली महायोगी सत्येन्द्र नाथ अपने गुरु द्वारा बताये गए उद्देश्य में सफल नहीं हो पते हैं तो ये भारत वर्ष के धर्म व अध्यात्मिक ज्ञान को अब तक की सबसे बड़ी क्षति होगी और शायद इसी के साथ कौलान्तक पीठ का सूर्य व हिमालय का आदि सनातन ज्ञान का पुंज समाप्त हो जाएगा.............!!!!!!....................किन्तु हमें परेशान होने की अभी जरूरत नहीं क्योंकि अभी हमारे बीच स्वयं कौलान्तक पीठाधीश्वर महायोगी सत्येन्द्र नाथ जी महाराज है, जिनको स्वयं "प्रातः स्मरणीय योग कुल नायक पुज्पाद श्री सिद्ध सिद्धांत नाथ जी महाराज" नें बाल्यकाल से ही तराश कर तैयार किया है, अपने चार शियों को एक सा ज्ञान दिया और परीक्षा में सफल हुए सबसे छोटे महायोगी सत्येन्द्र नाथ, जिनको इस महान पीठ का पीठाधीश्वर बना दिया गया है, और सबसे बड़ी प्रसन्नता की बात तो ये भी हैं कि कुछ ही समय में महायोगी जी नें पीठ को पुन: स्थापित करने का कार्य शुरू भी कर दिया है अब हिमालय का ज्ञान फिर जन-जन तक पहुंचेगा, सभी गुप्त विद्याएँ उजागर होंगी आम मानव भी धर्म के सभी पहलुओं को समझ सकेगा, हिमालय का अध्यात्मिक जीवन फिर लौटने लगा है, हालाँकि अभी मामूली सफलताएँ ही हाथ लगी हैं, किन्तु ये बीज ही तो बृक्ष बनेगा, अब फिर तपस्वियों नें हिमालय का रुख कर दिया है, अब फिर हिमालय अपने ज्ञान व तेज से जीवंत हो रहा है, कुच्छ हाथ मिल कर भारत की इस महान परंपरा को संजोने के लिए आगे आये हैं जिन्हें महायोगी नें थम लिया है.....बस यही एक शुभ शुरुआत है.........