चमत्कार और महायोगी

posted Jun 23, 2011, 12:05 PM by Site Designer
                                                 कौतुक विद्यापति 
चमत्कार की दो श्रृंखलाएं हैं, एक तो कौतुक विद्या जिसका सीधा सा अर्थ है बाजीगरी या जादूगरी,जिसके पीछे यंत्र, व्यवस्था, औषधि, रसायन, विशेष उपकरण व प्रस्तुति का सहारा लिया जाता है और जनता को अथवा दर्शक को विस्मृत किया जा सकता है, किन्तु ये एक कला है जिसका उद्देश्य मनोरंजन करना ही है और दूसरी श्रृंखला में दैविक चमत्कार आते हैं, जो केवल ईश्वर की कृपा से ही घटित होते हैं, महायोगी जी को कौतुक विद्या का गुरु भी कहा जाता है किन्तु दैविक चमत्कारों के बारे में महायोगी जी साफ शब्दों में कहते हैं कि मैं कोई दैविक चमत्कार नहीं करता, जो चमत्कार मेरे जीवन में हुए हैं उन पर भी मेरा बस नहीं था, मैं केवल प्रार्थना करता हूँ और चमत्कार होने लगता है, ये मेरे लिए ही नहीं सबके लिए सामान है" शायद ही किसी महायोगी या परमहंस नें इतना स्पष्ट कहा हो, सब नकली जाल बुनते रहते हैं, ताकि लोगों को मूर्ख बनाया जा सके, किन्तु महायोगी जी को किसी से ज्यादा कुछ तो लेना देना है नहीं इसलिए प्रपंचों से दूर आत्मकल्याण के पथ पर गतिशील हैं, किन्तु उनके साथ रहने वालों को अच्छी तरह मालूम है कि स्वयं महायोगी जी कितने दैविक चमत्कारों से भरे हुए हैं, हो सकता है कि ये केवल हमारा माना ही हो, या हमारी आस्था या भक्ति हो, किन्तु ज्यादा यहाँ कहना ठीक नहीं, अन्यथा आप कहेंगे कि अन्धविश्वास को बढ़ावा दिया जा रहा है, हमारी हो सकता है एक अलग दुनिया हो, थोड़े बहुत अन्धविश्वासी भी हो गए हों पर मैं ये जानता हूँ कि जब कोई मान रोटी है कहती है कि महायोगी जी संतान नहीं है, महायोगी जी प्रेम से आशीर्वाद दे कर कहते हैं कि मैं प्रार्थना करता हूँ और संतान प्राप्ति हो जाती है, तो मेरा मतलब पूरा हो जाता है, ये कैसे हुआ? क्यों हुआ? क्या कारण था? नहीं जानता, ये बातें तो स्वयं कोई योगी या परमहंस ही समझ सकता है, किन्तु कौतुक विद्या के बारे में जरूर मैं ये कहना चाहूँगा कि मैंने स्वयं महायोगी जी को कौतुक विद्या के द्वारा चमत्कार करते देखा है, ये समझना बड़ा ही जरूरी है कि कौतुक विद्या का महत्त्व क्यूँ है?
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